भारतीय भाषाएं देश की आत्मा की सच्ची अभिव्यक्ति” — वर्धा में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू का संबोधन
वर्धा, 16 अप्रैल राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने कहा है कि भारतीय भाषाएं देश की आत्मा की सच्ची अभिव्यक्ति हैं। उन्होंने बताया कि विभिन्न भारतीय भाषाओं के माध्यम से संस्कृति, संवेदनशीलता और चेतना की एक साझा धारा प्रवाहित होती है, जो भारत की एकता को और सुदृढ़ बनाती है।
महाराष्ट्र के वर्धा स्थित महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में गुरुवार को संबोधित करते हुए राष्ट्रपति ने प्रसन्नता व्यक्त की कि देश के विभिन्न राज्यों, विशेषकर उत्तर-पूर्व क्षेत्र के विद्यार्थी बड़ी संख्या में यहां शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि हिंदी सहित सभी भारतीय भाषाओं के विकास में अंतर-भाषाई संवाद की परंपरा अहम भूमिका निभाती है।
राष्ट्रपति मुर्मू ने छात्रों को अपनी सांस्कृतिक विरासत पर गर्व करने की प्रेरणा दी और दो प्रमुख राष्ट्रीय उद्देश्यों पर ध्यान केंद्रित करने का आह्वान किया—पहला, औपनिवेशिक मानसिकता के अवशेषों को समाप्त करना और दूसरा, भारतीय ज्ञान परंपरा का पुनर्जीवन करना। उन्होंने स्पष्ट किया कि किसी भी भाषा का विरोध नहीं, बल्कि सभी भारतीय भाषाओं का सम्मान होना चाहिए।
उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय का नाम महात्मा गांधी के नाम पर होना अत्यंत सार्थक है और इससे जुड़े सभी लोगों को हिंदी तथा अन्य भारतीय भाषाओं के प्रचार-प्रसार के लिए समर्पित रहना चाहिए। उन्हें विश्वास है कि विश्वविद्यालय गांधीजी के आदर्शों पर चलते हुए अपनी प्रतिष्ठा को और ऊंचाइयों तक पहुंचाएगा।
शिक्षा के महत्व पर प्रकाश डालते हुए राष्ट्रपति ने कहा कि महात्मा गांधी शिक्षा को आत्मनिर्भरता का आधार मानते थे। उनके अनुसार, वही शिक्षा सार्थक है जो आम जनता के जीवन से जुड़ी हो और राष्ट्रीय हित में योगदान दे। उन्होंने कहा कि जो शिक्षा समाज की भावनाओं को समझकर जिम्मेदारी निभाती है, वही सच्ची शिक्षा कहलाती है।
राष्ट्रपति ने जोर देकर कहा कि रचनात्मकता, नवाचार और मौलिक सोच अपनी मातृभाषा में ही सबसे प्रभावी ढंग से विकसित होती है। उन्होंने छात्रों से अनुकरण के बजाय मौलिकता को अपनाने का आह्वान किया और कहा कि भारतीय भाषाओं की मजबूत नींव पर ही एक शक्तिशाली, आत्मनिर्भर और विकसित भारत का निर्माण संभव है।
उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि विश्वविद्यालय के छात्र अपने व्यक्तिगत विकास के साथ-साथ राष्ट्र-निर्माण में भी महत्वपूर्ण योगदान देंगे और वैश्विक स्तर पर भारत की प्रतिष्ठा को नई ऊंचाइयों तक ले जाएंगे।