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संसद में महिलाओं की एंट्री से क्यों डरता रहा विपक्ष? पीएम मोदी का बड़ा हमला

लोकसभा में महिला आरक्षण संशोधन विधेयक के समर्थन में बोलते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विपक्ष की उस सोच पर सीधा हमला किया, जो वर्षों से महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी को सीमित करती रही है। उन्होंने कहा कि यह वही मानसिकता है, जो पंचायतों में महिलाओं को आरक्षण देने में तो सहज है, लेकिन जब वही महिलाएं संसद और विधानसभा में बराबरी से बैठने आती हैं, तो असहज हो जाती है।

प्रधानमंत्री ने विपक्ष पर आरोप लगाते हुए कहा कि पंचायत स्तर पर आरक्षण देते समय उन्हें अपनी कुर्सी का डर नहीं होता। उन्हें लगता है कि गांव की राजनीति से उनके बड़े पदों पर कोई असर नहीं पड़ेगा। लेकिन जब बात संसद और विधानसभा की आती है, तो यही नेता घबरा जाते हैं, क्योंकि वहां उनकी सत्ता और प्रभाव पर सीधा असर पड़ सकता है। यही कारण रहा कि पिछले 27 वर्षों तक महिला आरक्षण विधेयक को टालते रखा गया।

उन्होंने यह भी कहा कि अब हालात बदल चुके हैं। पंचायतों में काम कर चुकी महिलाएं अब जागरूक हो चुकी हैं। उनके भीतर राजनीतिक चेतना विकसित हो गई है। आज वे सिर्फ नाम मात्र की प्रतिनिधि नहीं हैं, बल्कि अपनी आवाज उठाने वाली, निर्णय लेने की क्षमता रखने वाली मजबूत नेता बन चुकी हैं। अब किसी भी दल के लिए उनका विरोध करना आसान नहीं रह गया है।

प्रधानमंत्री मोदी ने महिलाओं के कार्यों को लेकर बनी पुरानी सोच पर भी तीखा प्रहार किया। उन्होंने कहा कि अब महिलाएं सिर्फ सफाई, झाड़ू-कचरा या सामाजिक कल्याण तक सीमित नहीं रहना चाहतीं। वे अब नीति निर्माण का हिस्सा बनना चाहती हैं। वे केवल योजनाओं को लागू करने वाली नहीं, बल्कि उन्हें बनाने वाली बनना चाहती हैं।

उन्होंने विपक्ष को चेतावनी देते हुए कहा कि जो भी राजनीतिक दल महिलाओं के इस अधिकार के रास्ते में बाधा बनेगा, उसे आने वाले समय में भारी राजनीतिक नुकसान उठाना पड़ेगा। उन्होंने साफ कहा कि देश की बहनों पर भरोसा करना होगा, उनकी समझ और क्षमता को स्वीकार करना होगा।

प्रधानमंत्री ने भरोसा जताते हुए कहा कि अगर संसद और विधानसभाओं में 33 प्रतिशत महिलाओं को अवसर दिया जाए, तो वे खुद अपने और देश के भविष्य का बेहतर फैसला कर सकती हैं।

इस दौरान उन्होंने पंचायतों में महिलाओं के आरक्षण के इतिहास का भी जिक्र किया। 1992 में 73वें संविधान संशोधन के जरिए पंचायतों में कम से कम 33 प्रतिशत आरक्षण महिलाओं के लिए अनिवार्य किया गया था। इस कदम ने देश की लाखों महिलाओं को राजनीति में आने का अवसर दिया और उन्हें जमीनी स्तर पर नेतृत्व का अनुभव मिला।

बाद में कई राज्यों ने इस आरक्षण को बढ़ाकर 50 प्रतिशत तक कर दिया। बिहार इस दिशा में अग्रणी रहा, जिसके बाद कई अन्य राज्यों ने भी यही मॉडल अपनाया। आज देश के 20 से अधिक राज्यों में पंचायतों में महिलाओं को 50 प्रतिशत आरक्षण दिया जा रहा है।

अगर आंकड़ों की बात करें तो आज देश में लगभग 14 लाख से अधिक महिलाएं पंचायत प्रतिनिधि के रूप में कार्य कर रही हैं। कुल निर्वाचित प्रतिनिधियों में उनकी हिस्सेदारी 46 प्रतिशत से भी ज्यादा हो चुकी है। यह दिखाता है कि महिलाएं राजनीति में न सिर्फ भाग ले रही हैं, बल्कि प्रभावी भूमिका भी निभा रही हैं।

प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि यही महिलाएं अब संसद और विधानसभा में अपनी जगह बनाने के लिए तैयार हैं। जो दरवाजे इतने सालों से बंद थे, अब वे खुलने जा रहे हैं।

यह भाषण न सिर्फ महिला आरक्षण के समर्थन में था, बल्कि एक बड़े सामाजिक बदलाव का संकेत भी था—जहां महिलाएं अब केवल सहभागी नहीं, बल्कि नेतृत्वकर्ता बनने की ओर बढ़ रही हैं।

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