दिशा बोध: गति के साथ सही दिशा का महत्व
Rewrite by : Shekh Jamirul Haque Khan Choudhary
जीवन की सार्थकता, आनंद और शांति उसी व्यक्ति को प्राप्त होती है जिसका जीवन निरंतर गतिमान रहता है। गति दरअसल सृजनात्मकता और प्रगति का ही दूसरा नाम है। यदि जीवन में गति न हो, तो शरीर निष्क्रिय (जड़) हो जाता है और मन नीरस व बोझिल होने लगता है।
निरंतर चलते रहना ही जीवन है
शास्त्रों का प्रसिद्ध उद्घोष है— 'चरैवेति चरैवेति' (अर्थात चलते रहो, चलते रहो)। इसका मूल संदेश यह है कि जीवंत रहने के लिए शरीर और मन दोनों को सक्रिय रखना अनिवार्य है। एक पुरानी कहावत भी इसी ओर संकेत करती है:
"यदि आप उड़ नहीं सकते तो दौड़ें, दौड़ नहीं सकते तो चलें, और यदि चल भी नहीं सकते तो रेंगें, लेकिन रुकें नहीं।"
गति के साथ 'दिशा' का चुनाव
स्वस्थ जीवन के लिए सक्रियता जितनी जरूरी है, उतना ही महत्वपूर्ण है 'दिशा बोध' यानी यह जानना कि हम किस ओर जा रहे हैं। बिना किसी निश्चित दिशा के की गई गति निरर्थक होती है। प्रकृति ने मनुष्य को दूरदृष्टि और असीमित मानसिक व आध्यात्मिक शक्तियाँ इसीलिए दी हैं, ताकि वह केवल अपनी दैनिक जरूरतों (रोटी, कपड़ा, मकान) तक सीमित न रहे, बल्कि अपने जीवन के उच्च उद्देश्यों को पहचाने।
भटकाव के कारण और परिणाम
प्रकृति की हर मनुष्य से कुछ विशेष अपेक्षाएँ होती हैं। जो व्यक्ति अपनी सामर्थ्य का सही उपयोग नहीं करता, वह अंततः अपनी मानसिक शांति और संतोष खो देता है। अक्सर लोग निम्नलिखित कारणों से अपने सही मार्ग से विचलित हो जाते हैं:
मोह और आसक्ति: संतान या अपनों के प्रति अत्यधिक मोह कई बार बुद्धिमान व्यक्तियों को भी गलत रास्ते पर ले जाता है।
लालच: धन और संपत्ति की अत्यधिक लालसा योग्य व्यक्तियों को भी उनके लक्ष्य से दिग्भ्रमित कर देती है।
इन भटकावों के कारण न केवल व्यक्ति का, बल्कि समाज और देश का भी भारी अहित होता है।
निष्कर्ष
रात का अंधकार सितारों के चमकने से नहीं, बल्कि सूर्य के अस्त होने से होता है। ठीक उसी तरह, एक सामर्थ्यवान व्यक्ति जब सही दिशा का चुनाव करके उस पर निरंतर आगे बढ़ता है, तो वह न केवल ईश्वर की योजना में सहभागी बनता है, बल्कि अपने साथ-साथ दूसरों के जीवन को भी प्रकाशवान (प्रेरित) करता है।
— हरीश बड़थ्वाल