व्यवस्था की बेड़ियाँ और आम आदमी का संघर्ष....
हजारीबाग: आज का दौर एक अजीब विरोधाभास से गुजर रहा है। एक तरफ भव्यता के नारे हैं, तो दूसरी तरफ बुनियादी सुविधाओं के लिए कतार में खड़ा आखिरी आदमी। हम किस दिशा में जा रहे हैं?
धर्म बनाम धर्मांधता
धर्म हमें जोड़ना और नैतिकता सिखाता है, लेकिन आज उसे एक "ढाल" बना दिया गया है। जब आम आदमी को अपनी बदहाली, बेरोजगारी और महंगाई पर सवाल पूछना चाहिए, तब उसे दूसरे का भय दिखाकर जयकारों में उलझा दिया जाता है। याद रखिए, हवाई सफर का आनंद लेने वाले कभी नहीं चाहेंगे कि कतार में खड़ा व्यक्ति अपने अधिकारों के लिए जागरूक हो।
बढ़ती खाई और मौन तंत्र
• अमीर बनाम गरीब: संसाधनों पर चंद लोगों का कब्जा है, जबकि बहुसंख्यक आबादी अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है।
• भ्रष्टाचार का चरम: चुनाव जीतने के बाद जनसेवा 'स्वार्थ-सेवा' में बदल जाती है।
• सामाजिक सुरक्षा: मौलिक अधिकार कागजों तक सीमित रह गए हैं।
हमारा दायित्व: जागृत होना होगा
"स्वधर्मे निधनं श्रेय:, परधर्म भयावह:" अपने धर्म में रहने का अर्थ केवल पूजा-पाठ नहीं, बल्कि अपने कर्तव्य और अधिकारों के प्रति सचेत रहना भी है। व्यवस्था की सड़ांध में खुद को 'एडजस्ट' कर लेना कायरता है। योग हमें लड़ना सिखाता है, अन्याय के सामने झुकना नहीं।
"हम ही हम हैं तो क्या हम हैं, तुम ही तुम हो तो क्या तुम हो।
चमन में एख्तिलाते रंगों-बू से बात बनती है।"
विविधता और एकजुटता ही इस देश की असली ताकत है, न कि नफरत और डर। अगर आज हम सिस्टम की गिरावट और भ्रष्टाचार के खिलाफ नहीं बोले, तो आने वाली पीढ़ियों को केवल खोखले नारे विरासत में मिलेंगे।
राजनीति से परे, एक इंसान के तौर पर यह सोचने का समय है—क्या हम वाकई तरक्की कर रहे हैं या हमें सिर्फ भ्रम के गलियारों में घुमाया जा रहा है? मुस्कुराते चेहरों के पीछे छिपे दर्द को पहचानिए और व्यवस्था परिवर्तन की मशाल बनिए।
राहुल गुप्ता ✍️