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सरकारी मोहर और बिकता ज़हर

शीर्षक: सरकारी मुहर और बिकता ज़हर 🖋️🚫
गली-गली में सजी दुकानें, हर नुक़ड़ पर मेला है,
लिखा हुआ है साफ लफ़्ज़ में— 'सरकारी ठेका' है।
जिस शासन को ज़िम्मा था कि घर-घर को आबाद करे,
वही ज़हर अब बेच रहा है, ताकि तिजोरी याद करे।
सड़कों पर अब ज्ञान नहीं, बस गंदा पानी बहता है,
बाप नशे में चूर कहीं, और बच्चा भूखा रहता है।
ये राजस्व नहीं, ये लहू है उन बेबस परिवारों का,
जो जल जाते हैं भेंट चढ़कर, इन जहरीले बाज़ारों का।
उधर, ज्ञान की चौखट पर अब ताला लटका दिखता है,
गरीब का बच्चा फुटपाथों पर, मजबूरी में बिकता है।
खिड़की-दरवाजे बंद किए, स्कूलों को दफ़ना रहे,
पूंजीपतियों के हाथों में, भविष्य को पछाड़ रहे।
शर्म करो ओ सत्ताधीशों! कैसा ये व्यापार है?
शिक्षा का संहार यहाँ और ज़हर का जय-जयकार है।
एक तरफ तो ठेके चमके, जैसे कोई मंदिर हो,
दूजी तरफ स्कूल गिरे, जैसे कोई खंडहर हो।
कल की नस्लें पूछेंगी तब— तुम थे या ये व्यापार था?
उठो! कि फिर से तख्ती चमके, नशा मुक्त परिवेश बने,
जहाँ बिके न शिक्षा बाज़ारों में, ऐसा मेरा देश बने।
क्योंकि दारू से घर उजड़ते हैं, शिक्षा से संसार बनता है,
मदिरा से विनाश यहाँ और कलम से ही इंसान बनता है।✍️🙏
— कवि: कुंवर प्रताप यादवेंद्र सिंह यादव चंद्रवंशी उर्फ टाईगर भईया राष्ट्रीय अध्यक्ष वसुधैव कुटुंबकम् 😎🚩

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