नायक सबके,जाति किसकी ? पटोरी से राष्ट्र के नाम एक संदेश ।
भारत भूमि उन महान विभूतियों की साक्षी रही है जिन्होंने अपने कृतित्व से न केवल देश को नई दिशा दी, बल्कि मानवता का मार्ग प्रशस्त किया। महात्मा गांधी हों या बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर, इन महापुरुषों ने पूरे राष्ट्र के लिए त्याग किया। लेकिन आज का दौर इन महान आत्माओं को "जाति" के छोटे खानों में बांटकर देखने का हो गया है, जो न केवल उनका अपमान है बल्कि हमारे लोकतंत्र की आत्मा पर प्रहार भी है।
डॉ. भीमराव अंबेडकर ने जिस संविधान की रचना की, वह भारत के हर नागरिक की ढाल है। बचपन से हम उन्हें सम्मान के साथ "बाबा साहब" पुकारते आए हैं। लेकिन पिछले कुछ समय से उन्हें सिर्फ "भीम" और "भीमआर्मी" जैसे छोटे शब्द तक सीमित करने की कोशिश की जा रही है। क्या उनकी विराट छवि और उनका महान संघर्ष इतना छोटा था कि उन्हें एक विशेष वर्ग या संगठन की पहचान बना दिया जाए?
जब हम किसी महापुरुष को किसी खास जाति या "सेना" से जोड़ देते हैं, तो हम उन्हें पूरे देश के नायक से घटाकर एक समूह का नेता बना देते हैं। यह उन्हें छोटा करने की सोची-समझी साजिश है या अज्ञानता, यह विचारणीय है।
जैसा कि हम सब जानते है कि प्रभु श्री राम का जीवन समावेशी समाज का सबसे बड़ा उदाहरण है, जहाँ वे शबरी के बेर भी खाते हैं और केवट को गले भी लगाते हैं। यह प्रभु की लीला ही थी कि रामायण के दोनों मुख्य पात्र (राम और रावण) आज के हिसाब से सामान्य वर्ग से थे। यदि कहीं रावण किसी दबे-कुचले समाज से आता, तो आज का "मुध" समाज इसे भी एक जातीय युद्ध का रूप दे चुका होता। रामायण की सीख स्पष्ट है—व्यक्ति अपनी जाति से नहीं, बल्कि अपने "कर्म" और "आचरण" से अच्छा या बुरा होता है। बुराई किसी भी जाति में हो सकती है और अच्छाई भी।
आजादी के इतने वर्षों बाद भी यदि एक बड़ा वर्ग मुख्यधारा में नहीं जुड़ पाया है, तो आत्मचिंतन की आवश्यकता है। संविधान ने जो 'विशेष अधिकार' (आरक्षण) दिए, उनका उद्देश्य पिछड़ों को बराबर लाना था। लेकिन आज सवाल यह उठता है कि क्या इन सुविधाओं का सदुपयोग मेहनत के लिए किया जा रहा है?
सफलता का कोई "शॉर्टकट" नहीं होता। सामान्य वर्ग का युवा, जिसके पास न कोई सामाजिक आरक्षण है और न ही विशेष आर्थिक मदद, वह सिर्फ अपनी मेहनत के दम पर आगे बढ़ता है। यदि कोई वर्ग केवल आरक्षण के भरोसे रहकर मेहनत से जी चुराता है या दूसरे वर्गों के प्रति विद्वेष (नफरत) पालता है, तो वह बाबा साहब की विचारधारा के विपरीत चल रहा है। बाबा साहब ने "शिक्षित बनो" "संगठित रहो" और "संघर्ष करो" का नारा दिया था, "नफरत करो" का नहीं।
देश के किसी हिस्से में बाबा साहब की जयंती मन रही हो और उसी दिन भगवान परशुराम के मंदिर से "झंडा" उतारने जैसी घटना हो, तो यह लोकतंत्र के लिए काला दिन है। यह "बदले की भावना" देश को अंदर से खोखला कर रही है। महापुरुषों का सम्मान तभी है जब हम उनके बताए रास्ते पर चलें। किसी दूसरे के आराध्य का अपमान करके हम अपने नायक का कद ऊँचा नहीं कर सकते।
सवाल उठता है कि राजनीतिक पार्टी को तो राजनीति करना है लेकिन हमलोगों को ??
भारत की खूबसूरती तभी तक है जब तक हम एक-दूसरे के धर्म, जाति और महापुरुषों का सम्मान करें। 'जाति' और 'आरक्षण' का ठिकरा दूसरों पर फोड़ना आसान है, लेकिन खुद के भीतर झांककर मेहनत और ईमानदारी से राष्ट्र निर्माण में जुड़ना कठिन। देश में कठिनाई सभी वर्गों में है चाहे जिस रूप में हो , लेकिन उस कठिनाई को चीरते हुए मेहनती लोग अपना रास्ता बनाते ही हैं चाहे हो देश के पूर्व राष्ट्रपति ए पी जे अबुल कलाम हों या देश के कोई भी सफल व्यक्ति ।
जिस दिन हम जाति से ऊपर उठकर 'गुण' और 'कर्म' के आधार पर इंसान को परखना शुरू कर देंगे, उसी दिन बाबा साहब और श्री राम का सपना साकार होगा।
समाज को बांटने वाली विचारधाराएँ देश को केवल अंधकार की ओर ले जाएंगी। हमें यह समझना होगा कि संविधान अधिकार देता है, तो कर्तव्य भी सिखाता है। नफरत और बदले की भावना से कोई भी वर्ग महान नहीं बन सकता। महापुरुष पूरे राष्ट्र की धरोहर हैं, उन्हें जाति के पिंजरे से आजाद कीजिए।
"जाति-पाति के नाम पर, न कर देश का बंटवारा,मेहनत ही पहचान है, यही मंत्र है हमारा।"
मनीष सिंह
शाहपुर पटोरी
@ManishSingh_PT