आज एक कड़वा सच सामने खड़ा है… और उससे नज़रें चुराना अब संभव नहीं।
जिस उम्र में इंसान को अनुभव का दीपक बनकर समाज को रास्ता दिखाना चाहिए, उसी उम्र में अगर हम नफरत के वाहक बन जाएं — तो यह केवल दुर्भाग्य नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के साथ अन्याय है।
हम वो लोग हैं जिन्होंने देश को बनते-बढ़ते देखा है, जिन्होंने भाईचारे, प्रेम और एकता के किस्से जिए हैं… फिर आज क्यों हम वही ज़हर अपने ही घरों में घोल रहे हैं?
सोचिए…
क्या हमारी पहचान इतनी कमजोर हो गई है कि हमें दूसरों को नीचा दिखाकर ही खुद को ऊंचा साबित करना पड़ रहा है?
क्या हमारी समझ इतनी सीमित हो गई है कि हम हर बात को धर्म और जाति के चश्मे से देखने लगे हैं?
यह समय आग में घी डालने का नहीं है…
यह समय बुझती इंसानियत को बचाने का है।
हर वह मैसेज, हर वह पोस्ट…
जो नफरत को बढ़ाए —
वह सिर्फ शब्द नहीं होते,
वह समाज की जड़ों में जहर घोलते हैं।
हम 60 पार लोग अगर आज भी नहीं संभले,
तो आने वाली पीढ़ी हमें माफ नहीं करेगी।
वे हमसे सीखेंगे… और अगर हमने उन्हें नफरत सिखाई,
तो कल का भारत भी उसी आग में जलेगा।
रुकिए… सोचिए…
और खुद से एक सवाल पूछिए —
क्या मैं समाज को जोड़ रहा हूं या तोड़ रहा हूं?
आइए, एक संकल्प लें —
नफरत नहीं फैलाएंगे,
झूठ नहीं फैलाएंगे,
और किसी भी कीमत पर इंसानियत को मरने नहीं देंगे।
क्योंकि अंत में…
धर्म, राजनीति, विचार — सब पीछे रह जाते हैं,
अगर कुछ बचता है… तो वह है इंसानियत।
डॉ एम एस बाली