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SC-ST भूमि अनुमति को लेकर सवाल: कथित फर्जी परमिशन के आधार पर निर्णय पर निष्पक्ष जांच की मांग


गोरखपुर सदर तहसील से जुड़ा मामला संज्ञान में आया, तहसीलदार सदर द्वारा कथित रूप से बिना पर्याप्त जांच के दूसरे पक्ष के पक्ष में आदेश देने पर उठे सवाल

गोरखपुर। SC-ST वर्ग से संबंधित भूमि की अनुमति और उसके आधार पर दिए गए निर्णय को लेकर एक गंभीर मामला संज्ञान में आया है। आरोप है कि एक प्रकरण में कथित रूप से “फर्जी जिलाधिकारी” के नाम से जारी परमिशन को आधार बनाकर दूसरे पक्ष के व्यक्ति के पक्ष में फैसला दिया गया, जबकि उस अनुमति की सत्यता की विधिवत जांच आवश्यक थी।

मामले से जुड़े पक्ष का कहना है कि यदि किसी SC-ST भूमि के संबंध में अनुमति किसी सक्षम अधिकारी द्वारा विधिवत जारी नहीं की गई है, या अनुमति पत्र फर्जी/संदिग्ध है, तो ऐसे दस्तावेज के आधार पर कोई भी प्रशासनिक या राजस्व निर्णय न्यायसंगत नहीं माना जा सकता। आरोप यह भी है कि गोरखपुर के तहसीलदार सदर महोदय द्वारा उक्त परमिशन की प्रामाणिकता की गहन जांच किए बिना निर्णय दिया गया, जिससे पीड़ित पक्ष को न्याय से वंचित होना पड़ा।

कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, SC-ST वर्ग की भूमि से जुड़े मामलों में संबंधित राज्य के राजस्व कानूनों और सक्षम प्राधिकारी की अनुमति की प्रक्रिया का विशेष महत्व होता है। ऐसे मामलों में दस्तावेजों की सत्यता, अनुमति जारी करने वाले अधिकारी की वैधता, आदेश संख्या, कार्यालय रिकॉर्ड और संबंधित पत्रावली की जांच अत्यंत आवश्यक होती है।

पीड़ित पक्ष ने पूरे मामले की उच्च स्तरीय जांच कराने, कथित अनुमति पत्र की सत्यता की जांच कराने तथा यदि दस्तावेज फर्जी पाए जाते हैं तो जिम्मेदार लोगों के खिलाफ विधिक कार्रवाई की मांग की है।

सवाल यह उठता है कि यदि किसी कथित फर्जी परमिशन के आधार पर राजस्व फैसला दिया गया है, तो क्या ऐसे आदेश की पुनः समीक्षा नहीं होनी चाहिए? प्रशासन से अपेक्षा है कि मामले की निष्पक्ष जांच कर वास्तविक तथ्यों को सामने लाया जाए, ताकि न्यायिक और राजस्व प्रक्रिया पर आमजन का विश्वास बना रहे।

नोट
यह समाचार उपलब्ध जानकारी और लगाए गए आरोपों के आधार पर तैयार किया गया है। संबंधित अधिकारी या दूसरे पक्ष का बयान मिलने पर उसे भी प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।

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