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खाकी में लुटेरे: जब रक्षक ही बना भक्षक ? गोरखपुर राजघाट कांड — एक दारोगा सरेंडर, चार अभी भी फरार,



विजय कुमार | वरिष्ठ पत्रकार

वर्दी पहनने से पहले हर पुलिसकर्मी एक शपथ लेता है — जनता की रक्षा की, कानून के सम्मान की।
लेकिन गोरखपुर के राजघाट थाना क्षेत्र में जो घटना सामने आई है, वह उस शपथ के मुँह पर करारा तमाचा है।
एक दारोगा ने अपने साथियों के साथ मिलकर एक व्यापारी से 90,000 रुपये की लूट की — और जब क़ानून का शिकंजा कसा, तो एक ने सरेंडर किया, लेकिन एक महिला इंस्पेक्टर समेत चार आरोपी अब भी फरार हैं।

यह घटना अकेली नहीं है। यह एक बीमारी का लक्षण है।

घटना:
वर्दी की आड़ में डकैती क्यों?
गोरखपुर के राजघाट थाना क्षेत्र में एक व्यापारी के साथ जो हुआ, वह किसी फ़िल्मी कहानी जैसा लग सकता है — लेकिन यह कड़वी हकीकत है।
जिन्हें क़ानून का पहरेदार होना चाहिए था, उन्होंने ही खाकी की आड़ में 90,000 रुपये लूट लिए।

दबाव बढ़ने पर एक दारोगा ने सरेंडर किया और उसे जेल भेजा गया। लेकिन इस गिरोह की एक महिला इंस्पेक्टर समेत चार सदस्य अभी भी कानून की पकड़ से दूर हैं।

यह सवाल खड़ा करता है —
क्या पुलिस विभाग इन्हें सच में पकड़ना चाहता है?

क्या यह कोई अपवाद ?
क्या यह एक महामारी है?
उत्तर प्रदेश में पुलिस द्वारा व्यापारियों से लूट के मामले कोई नई बात नहीं। मेरठ के लोहिया नगर थाने के दो दारोगाओं ने एक धागा कारोबारी को जेल भेजने की धमकी देकर 20 लाख रुपये वसूले, जिसके बाद दोनों फरार हो गए।
वाराणसी में निलंबित दारोगा सूर्यप्रकाश पांडेय पर आरोप है कि उसने अपने साथियों के साथ मिलकर सर्राफा व्यापारी के 42 लाख रुपये लूट लिए।

कासगंज में सर्राफा व्यापारी से वसूली मामले में दो इंस्पेक्टर और एक पूर्व SOG प्रभारी के नाम सामने आने के बाद तीनों अधिकारी जिले से फरार हो गए।

पैटर्न एक ही है:
व्यापारी निशाने पर, वर्दी हथियार के रूप में, और फिर — फरार।

महिला इंस्पेक्टर का फरार होना — दोहरा सवाल,
इस मामले में सबसे चिंताजनक पहलू है एक महिला इंस्पेक्टर का फरार होना।
एक तरफ पुलिस बल में महिला सशक्तिकरण की बात होती है, दूसरी तरफ जब कोई महिला अधिकारी खुद ऐसे कांड में संलिप्त होकर भागती है — तो यह उस पूरी व्यवस्था की विफलता है जिसने उसे यह पद दिया।

प्रश्न यह है कि —
क्या विभाग ने उनकी तलाश में वास्तव में कड़ी कार्रवाई की?
या फरारी को 'समय के साथ ठंडा होने देने' की पुरानी परिपाटी चल रही है?

सरेंडर —
राहत नहीं, जवाबदेही की शुरुआत है,

एक दारोगा का सरेंडर करना और जेल जाना — यह न्याय नहीं, न्याय की पहली सीढ़ी मात्र है।
असली न्याय तब होगा जब
पीड़ित व्यापारी को लूटी गई रकम वापस मिले, फरार चारों आरोपी गिरफ्तार हों, आरोपियों की सेवा से बर्खास्तगी हो और पीड़ित पर मामला वापस लेने का दबाव न डाला जाए।

निष्कर्ष:
खाकी की साख दाँव पर है,
गोरखपुर पुलिस का इतिहास पहले से ही विवादों से भरा रहा है।
गोरखपुर में एक दारोगा पर 50 लाख रुपये लूटने का आरोप लगा था, जिसे सस्पेंड कर विभागीय जांच शुरू की गई थी। अब राजघाट का यह कांड उसी कड़ी का नया अध्याय है।

जनता पुलिस से डरती नहीं — जनता पुलिस पर भरोसा करना चाहती है। लेकिन जब वर्दी खुद ही लूट का औज़ार बन जाए, तो वह भरोसा रोज़ थोड़ा-थोड़ा टूटता है।

"जो क़ानून बनाने वाले हैं, वे क़ानून तोड़ें — तो क़ानून का राज नहीं, लाठी का राज होता है।"

फरार चारों आरोपियों की तत्काल गिरफ्तारी होनी चाहिए — यह माँग नहीं, यह जनता का अधिकार है।

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