मैं ज़िंदा हूँ, एक ख़ूबसूरत कहानी:- त्रिभुवन गुप्ता
एक पार्टी में जहाँ कई मशहूर हस्तियाँ मौजूद थीं, एक बुज़ुर्ग महिला मंच पर छड़ी के सहारे आई और अपनी सीट पर बैठ गई। होस्ट ने पूछा, “क्या आप अब भी डॉक्टर के पास अक्सर जाती हैं. बुज़ुर्ग महिला बोली, “हाँ, मैं तो अक्सर जाती हूँ!”होस्ट ने पूछा, “क्यों?”बुज़ुर्ग महिला मुस्करा कर बोली, “मरीज़ों को तो डॉक्टर के पास जाना चाहिए, तभी तो डॉक्टर ज़िंदा रहेगा!” श्रोता तालियों से गूंज उठे उस बुज़ुर्ग महिला की हाज़िर-जवाबी पर। फिर होस्ट ने पूछा, “तो क्या आप फार्मासिस्ट के पास भी जाती हैं. बुज़ुर्ग महिला बोली, “ज़रूर!क्योंकि फार्मासिस्ट को भी तो जीना है!”अबकी बार और ज़्यादा तालियाँ बजीं। होस्ट ने हँसते हुए पूछा, “तो फिर क्या आप फार्मासिस्ट की दी हुई दवा भी लेती हैं, बुज़ुर्ग महिला बोली, “नहीं! दवाइयाँ तो अक्सर फेंक देती हूँ. मुझे भी तो जीना है, इस पर तो पूरा हॉल ठहाकों से गूंज उठा। अंत में होस्ट ने कहा, “आपका धन्यवाद कि आप इस इंटरव्यू के लिए आईं।” बुज़ुर्ग महिला बोली, “आपका स्वागत है! मुझे मालूम है, आपको भी तो जीना है, श्रोता इतने हँसे कि देर तक तालियाँ बजती रहीं। फिर एक और सवाल हुआ, “क्या आप अपने व्हाट्सएप ग्रुप में भी एक्टिव रहती हैं, बुज़ुर्ग महिला बोली, “हाँ, बीच-बीच में मैसेज भेजती रहती हूँ, ताकि सबको लगे कि मैं ज़िंदा हूँ!वरना सब समझेंगे कि मैं चली गई और ग्रुप एडमिन मुझे हटा देगा, तो मेरे प्यारे दोस्तो, मुस्कुराते रहिए, संदेश भेजते रहिए, और अपनों से जुड़े रहिए लोगों को पता चलता रहना चाहिए कि आप ज़िंदा हैं, खुश हैं, और तंदरुस्त हैं , शरीर से भी और मन से भी मरने की खबर तो समाचारपत्र से या अन्य किसी माध्यम से मिल ही जाएगी। अगर आप जिंदा है तो मिलिए.और आप जिंदादिल भी हैं तो नित्य उत्सव मनाते रहिए. याद रखो उत्सव अकेले नहीं मना सकते. ज़िंदगी है, तो जिंदा-दिली भी होनी चाहिए.