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सीख रहा हूँ चेहरा पढ़ने का हुनर, सुना है—किताबों से ज़्यादा चेहरे पर लिखा होता है।

वाशिंग मशीन आर के सिंह
राजनीति के गलियारों से जो खबरें आ रही हैं, उनमें वंशवाद परंपरा को लेकर खूब शोर-शराबा देखने को मिल रहा है। खुद को “साफ छवि” और “वंशवाद विरोधी” बताने वाली पार्टियों से आज जनता कुछ सीधे सवाल पूछ रही है—
लालू प्रसाद यादव लाल तेजस्वी यादव , सोनिया गांधी के लाल परिवारबाद हैं?
मुलायम सिंह यादव के लाल अखिलेश यादव परिवारवाद है और यह राजनीतिक परंपरा का हिस्सा नहीं हैं?
तो फिर सवाल ये भी उठता है—क्या सम्राट चौधरी अपने परिवारिक राजनीतिक आधार से अलग हैं?
क्या जय शाह का उभार केवल योग्यता के आधार पर हुआ, या उसके पीछे भी कोई पारिवारिक प्रभाव है।भाजपा में प्रमुख नेता (या उनके परिवार) जो वंशवाद के अंतर्गत चर्चा में रहते हैं:
गुरुवीर सिंह बराड़: विधायक गुरजंट सिंह के पुत्र, सार्दुलशहर से।
मंजीत चौधरी: पूर्व विधायक धर्मपाल चौधरी के पुत्र, मुंडावर से।
डॉ. शैलेष: पूर्व मंत्री डॉ. दिगंबर सिंह के बेटे, डीग कुम्हेर से।
हेमंत मीणा: पूर्व मंत्री नंदलाल मीणा के बेटे, प्रतापगढ़ से।
विक्रम बंशीवाल: पूर्व विधायक जियालाल बंशीवाल के बेटे।
कैलाश मेघवाल (पिलानी): विधायक सुंदरलाल के पुत्र।
अतुल भंसाली: चाचा कैलाश भंसाली के पदचिन्हों पर, जोधपुर शहर से।
अन्य राज्य: मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और बिहार में भी भाजपा उम्मीदवारों में पूर्व नेताओं के रिश्तेदार शामिल रहे हैं।
जनता ये भी देख रही है कि कुछ लोग जब तक एक पार्टी में रहते हैं, तब तक उन पर सवाल उठते हैं—लेकिन जैसे ही वे दूसरी पार्टी में शामिल होते हैं, खासकर सत्ता के करीब जाते हैं, उनकी छवि “पवित्र” कैसे हो जाती है?
क्या सच में कोई ऐसी “वॉशिंग मशीन” है, जहाँ
भ्रष्टाचार, अपराध, स्मगलिंग जैसे आरोप भी धुल जाते हैं?
या फिर ये सिर्फ सत्ता की ताकत का खेल है?
जनता अब जागरूक है, और वह सिर्फ भाषण नहीं—समान मापदंड चाहती है।
वंशवाद अगर गलत है, तो हर जगह गलत होना चाहिए—
और अगर सही है, तो फिर उसका विरोध सिर्फ दिखावा क्यों?
यही वो सवाल हैं, जिनका जवाब अब जनता जानना चाहती है।

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