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चम्बा की संस्कृति में बसोआ और महत्व. .

बसोआ की प्रतीक्षा: चम्बा की बेटी और मायके का मौन

हिमाचल प्रदेश के चम्बा ज़िले में वैसाखी केवल एक पर्व नहीं, बल्कि भावनाओं का ऐसा संगम है जिसमें रिश्तों की गरमाहट, परंपराओं की सुगंध और यादों की नमी एक साथ बहती है। यहां इसे “बसोआ” कहा जाता है—एक ऐसा अवसर, जब बेटी अपने मायके की चौखट पर लौटती है, केवल एक मेहमान बनकर नहीं, बल्कि उस घर की धड़कन बनकर, जहां से उसकी जीवन-यात्रा शुरू हुई थी।
लेकिन आज, इस बसोआ की प्रतीक्षा में एक गहरी खामोशी भी घुलने लगी है। चाहे वो रिश्तों में अहसास की कमी, आधुनिकता का प्रवेश और संवेदना की कमी हो,बसोआ अधिकतर सूनापन ही ला रहा है. .

चम्बा की संस्कृति के लोकगीतों में गाई जाने वाली संवेदना और रिश्तों की डोर को पिरोने वाली गाथा, जो पारंपरिक तरीके के साथ साथ चम्बा के प्रसिद्ध लोकगायकों ने भी अपनी मधुर आवाज में पिरोया है..
प्रसिद्ध लोकगायक पियूष राज की मनमोहक और सुरीली आवाज़ आज भी इस त्योहार के अवसर को रिश्तों की संजीदगी से सराबोर कर देती है.

आया बसोआ वो माए..पंजे सत्ते ..मिंजो भाऊए रा सादा न आया हो…

बेटी उदास और भावुक होकर संदेश देती है..
अम्मा जो बोलणा..बेदर्दी ए ..अम्मा तिज्जो मेरी दर्द न आई हो…

“भाई का बुलावा नहीं आया...”
यह एक साधारण-सा वाक्य नहीं, बल्कि चम्बा की हर उस बेटी के हृदय का दर्द है, जो बसोआ के दिन अपने मायके जाने की आस में दरवाज़े की ओर बार-बार देखती है। परंपरा रही है कि इस पर्व पर भाई अपनी बहन को ससम्मान घर बुलाता है—यह निमंत्रण केवल रस्म नहीं, बल्कि प्रेम और अपनत्व का प्रतीक होता है।

बसोए के अवसर पर पिंदड़ी बनाकर बेटी को खिलाने और मां का ह्दय खुशी से भर जाता था..परंतु बुलावा न आने पर बेटी भावुक होकर कहती है कि पिंदड़ी बेशक खुद खा लेना परंतु पट्ठे अर्थात पत्ते उसे भेज देना. ..
आज की बदलती जीवनशैली में, यह बुलावा कहीं खोता-सा प्रतीत हो रहा है।
मोबाइल के एक संदेश या औपचारिक कॉल ने उस सजीव आमंत्रण की जगह ले ली है, जिसमें भाई स्वयं बहन के ससुराल पहुंचता था, उसकी आँखों में खुशी के आँसू होते थे और कदमों में अपनापन। अब कई बेटियाँ चुपचाप अपने मन को समझा लेती हैं—“शायद व्यस्त होंगे…”, “समय नहीं मिला होगा…”
पर क्या सच में केवल समय की कमी है, या रिश्तों की प्राथमिकताएँ बदल रही हैं?
बसोआ: परंपरा से भावनाओं तक
बसोआ केवल खेतों में नई फसल की खुशहाली का पर्व नहीं समकि यह बेटी और मायके के रिश्ते की पुनर्स्थापना का दिन है। यह वह क्षण होता है जब बेटी अपने बचपन की गलियों में फिर से लौटती है—जहां हर कोना उसे पहचानता है।
माँ के हाथों का बना पकवान, आँगन में खिलखिलाती हँसी, और भाई का स्नेहिल साथ—ये सब मिलकर बसोआ को एक जीवंत अनुभव बनाते हैं। परंतु जब यह बुलावा नहीं आता, तो केवल एक त्योहार नहीं छूटता, बल्कि एक भावनात्मक धागा भी कमजोर पड़ जाता है।
बदलते समय में रिश्तों की परीक्षा
आज जब हम आधुनिकता और व्यस्तता के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रहे हैं, तब कहीं न कहीं हमारे पारंपरिक रिश्ते उपेक्षा के शिकार हो रहे हैं। बेटी, जो कभी मायके की शान और पहचान होती थी, अब कई बार केवल एक “औपचारिक सदस्य” बनकर रह जाती है।
यह स्थिति केवल सामाजिक परिवर्तन का परिणाम नहीं, बल्कि हमारी संवेदनशीलता में आई कमी का भी संकेत है।
क्या हम भूलते जा रहे हैं कि एक बेटी के लिए मायका केवल एक घर नहीं, बल्कि उसकी पहचान, उसकी जड़ें और उसका संबल होता है?
एक आत्ममंथन की आवश्यकता बसोआ के इस पर्व पर, हमें केवल उत्सव मनाने की नहीं, बल्कि अपने रिश्तों की गहराई को समझने की भी आवश्यकता है। एक भाई का अपनी बहन को बुलाना केवल परंपरा निभाना नहीं, बल्कि यह संदेश देना है कि “तुम आज भी इस घर की सबसे अहम कड़ी हो।”
और एक बेटी के लिए यह बुलावा, उसके अस्तित्व को पुनः स्वीकार करने जैसा होता है।
निष्कर्ष: रिश्तों को फिर से जीने का समय
चम्बा की वादियों में बसोआ आज भी आता है, खेतों में हरियाली लाता है, घरों में रौनक भरता है। परंतु यदि इस पर्व की आत्मा—रिश्तों की गर्माहट—कमज़ोर पड़ जाए, तो यह केवल एक औपचारिकता बनकर रह जाएगा।
आज जरूरत है कि हम फिर से उन परंपराओं को जीवित करें, जो हमें जोड़ती हैं। एक भाई फिर से अपनी बहन के दरवाज़े पर जाए, और एक बहन पूरे अधिकार से कह सके—
“मुझे पता था, मेरा मायका मुझे कभी नहीं भूलेगा…”
बसोआ केवल पर्व नहीं, बल्कि रिश्तों की पुनर्जागरण की पुकार है—जिसे सुनना और निभाना हम सभी की जिम्मेदारी है.

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