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अमेरिका के रक्षा सचिव पीट पगलू हेगसेथ अमेरिकी संसद के आगे कटोरा लेके खड़े हैं।

कह रहे हैं कि ईरान युद्ध के लिए उन्हें 200 बिलियन डॉलर का अतिरिक्त बजट दिया जाए। जो डिफेंस बजट था उसमें पूर्ति नहीं पढ़ रही है।

इस युद्ध में एक दिन का खर्च ही करीब 1 बिलियन डॉलर आ रहा था। और शुरुआती 28 दिन में अमेरिका करीब 31 बिलियन डॉलर खर्च कर चुका था।

पैसा मांगने की रिक्वेस्ट के साथ पीट पगलू ने बताया कि हमारे असलहा- बारूद का भंडार खत्म होने को है। हमें उसे वापस भरना है इसके लिए पैसा चाहिए।

यूक्रेन की मदद में हमने बहुत असलहा-बारूद भेजा थ। फिर उसके बाद इजरायल को भी दिया था। उसके बाद पिछले साल हम खुद भी लड़ने चले गए और खूब बमबारी की। भंडार तो खत्म होगा न, कोई अनलिमिटेड थोड़ी है।

अमेरिकी संसद ने विरोध किया। उन्होंने कहा कि जब अमेरिका के रक्षा विशेषज्ञ और आर्मी जनरल मना कर रहे थे तो युद्ध में घुसे क्यों ?

पीट पगलू ने कहा कि बुरे लोगों को मारने में पैसा तो लगता है। चिंदीगिरी मत करो जेब ढीली करो..

तो सवाल हुआ कि, चलो बताओ "ये युद्ध कब तक चलेगा ?" पीट पगलू के पास इसका कोई जवाब नहीं था। क्योंकि वो जानता है उसका मालिक टिरंप है वो बताएगा, और उसका मालिक नेतनयाहू.. उसने काह हमारे पास इसका कोई फ्रेम वर्क नहीं है। इसका जवाब "बड़े वाले भूरे पगलू" देंगे..

विरोध का दूसरा कारण है कि, अमेरिका का टोटल ऋण 38 ट्रिलियन डॉलर है। उसकी किश्त चुकाने में ही देश का तेल निकल जा रहा है। तुम ऊपर से एक ऐसा फालतू का युद्ध और युद्ध का खर्चा डाल रहे ना तो इसकी जरूरत थी, और ना जिसका कोई हल नहीं निकलना।

तुमने तो युद्ध से पहले कोई परमिशन ली नहीं संसद से.. हमारी हालत नहीं इतना पैसा फालतू के युद्ध में उड़ाने की..

पीट पगलू ने 200 की बजाय 80-100 बिलियन की फॉर्मल रिक्वेस्ट संसद में रखने की बात की... की ज्यादा नहीं तो इतना ही दे दो यार.. कल को ईरान ने सीजफायर तोड़ दिया तो लड़ेंगे कैसे ?

क्या है कि अमेरिका के जो जहाज उड़े, रडार उड़े, रेस्क्यू मिशन में हेलीकॉप्टर और जेट उड़े.. वो बिलियन ऑफ़ डॉलर के थे। उन्हें खरीदने में रक्षा बजट पूरा नहीं पड़ेगा.. उनके अलावा ईरान ने कुछ निगरानी वाले ड्रोन भी गायब कर दिए और अरब के लगे मदर रडार उड़ा दिए, वो बहुत ज्यादा महंगे थे।

ईरान में डिक्टेटरशिप की वजह से सारी मिसाइलें, असलहा बारूद सरकारी तंत्र बनाता है। इसलिए खर्चा कम है। अमेरिका में कम्पनियां बैठी हैं जिन्हें देश से घंटा फर्क नहीं पड़ता। उन्हें मुनाफा चाहिए। चाहे उधार लेके दो या भीख मांग के। भले सारी कंपनी अमेरिका की है लेकिन उनको अपनी सरकार से पैसा मिलेगा तभी माल देंगी।

आप देखिए दुनियां की सबसे रईस कंपनी, fortune 500 जिस देश की है उसी के ऊपर 38 ट्रिलियन का कर्जा है।

भूरे पगलू ट्रंप ने अरब देशों से भी गुहार लगाई/धमकी दी है कि इस युद्ध का खर्चा कवर करो। कुछ चंदा डालो। वो एक नंबर के मतलब परस्त है, उन्होंने अमेरिका से मुंह फेर लिया और आगे के लिए पाकिस्तान से जेट मंगवा लिए और अमेरिका की बजाय साउथ कोरिया और ब्रिटेन से असलहा बारूद खरीदने लगे।

मैने जब लिखा था कि अमेरिका को वक्त चाहिए क्योंकि उसका लड़ने का भंडार खत्म हो रहा तो कई लोगों ने माना नहीं था। अब ये अमेरिका का रक्षा सचिव कह रहा है। मैं कोई भविष्यवाणी नहीं करता। जियोपोइक्टिक्स में सब कुछ केलकुलेटिड होता है।

युद्ध किसी के लिए अच्छा नहीं। गला सबका सूखता है। जेब सबकी खाली होती है। खर्चा सबको भारी पड़ता है। ईरान तो तेल बेच के, टोल लगा के कमा लेगा। अमरीका को दूसरे देशों के राष्ट्रपति उठा के वहां तेल पर डकैती, कब्जा, छिनौती करनी पड़ेगी।

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