विरासत में मिला दर्द से जागरूकता की अलख: थैलेसीमिया मुक्त समाज की ओर बढ़ते कदम
भोपाल। एक ऐसी बीमारी, जो अनजाने में माता-पिता से बच्चों तक विरासत में पहुंच जाती है—थैलेसीमिया—आज भी अनेक मासूमों का बचपन छीन रही है। लेकिन इसी दर्द ने अब समाज में जागरूकता की नई अलख जगाने का काम शुरू कर दिया है।
छह महीने के आरव की कहानी कई परिवारों की हकीकत को दर्शाती है। जन्म के कुछ महीनों बाद उसकी मुस्कान फीकी पड़ने लगी, चेहरा पीला रहने लगा और जांच में सामने आया कि वह थैलेसीमिया मेजर से पीड़ित है। अब उसका बचपन खिलौनों से ज्यादा अस्पतालों और हर 15 दिन में चढ़ने वाले खून के सहारे बीत रहा है।
विशेषज्ञों के अनुसार, गर्भावस्था के दौरान HbA2 HPLC जैसे जरूरी टेस्ट समय पर हो जाएं, तो इस बीमारी की रोकथाम संभव है। लेकिन जागरूकता की कमी और कई बार जरूरी जांच न होने से आज भी थैलेसीमिया पीड़ित बच्चों का जन्म हो रहा है, जिससे परिवारों पर भारी आर्थिक और मानसिक बोझ पड़ता है। बोन मैरो ट्रांसप्लांट जैसे इलाज का खर्च लाखों रुपये तक पहुंच जाता है, जो सामान्य परिवारों के लिए बड़ी चुनौती बन जाता है।
इसी चुनौती को अवसर में बदलने के उद्देश्य से दिशा वेलफेयर एसोसिएशन ने समाज में जागरूकता बढ़ाने का अभियान तेज कर दिया है। संस्था का संदेश है—
“पहले थैलेसीमिया और सिकल सेल का ज्ञान, फिर शादी और संतान का अरमान।”
संस्था के संस्थापक सरबजीत सिंह नरंग ने कहा कि अब समय आ गया है कि शादी से पहले या गर्भावस्था के शुरुआती चरण में थैलेसीमिया जांच को अनिवार्य बनाया जाए और समाज मिलकर ‘जीरो थैलेसीमिया बर्थ’ का लक्ष्य तय करे।
यह पहल न केवल वर्तमान पीड़ित बच्चों को बेहतर जीवन देने की दिशा में महत्वपूर्ण है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को इस विरासत में मिले दर्द से बचाने का मजबूत संकल्प भी है। जागरूकता, जिम्मेदारी और समय पर जांच—इन्हीं तीन स्तंभों पर थैलेसीमिया मुक्त समाज का सपना साकार हो सकता है।