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सुशासन के दावों के बीच रायगढ़ में 'कमीशन राज' का काला चिट्ठा!! पीएम से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक गूंजी रायगढ़ की दास्तान: जीरो टॉलरेंस की सरकार में 2 से

सुशासन के दावों के बीच रायगढ़ में 'कमीशन राज' का काला चिट्ठा!!

पीएम से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक गूंजी रायगढ़ की दास्तान: जीरो टॉलरेंस की सरकार में 2 से 4 लाख में बिक रहीं प्लेसमेंट नौकरियां, ऑडिट की खुली चुनौती!!

रायगढ़@खबर सार :- एक तरफ सूबे की सरकार पारदर्शी प्रशासन और 'सुशासन' की वाहवाही लूट रही है, वहीं रायगढ़ कलेक्टर परिसर की नाक के नीचे स्थित जिला पंजीयक कार्यालय भ्रष्टाचार और तानाशाही का अभेद्य किला बन चुका है। सिस्टम की इस सड़ांध को किसी बाहरी ने नहीं, बल्कि उसी तंत्र का हिस्सा रहे एक प्लेसमेंट ऑपरेटर ने उजागर किया है। एक ऐसा महा-घोटाला, जहां अधिकारियों का 'अहंकार' दलालों की तिजोरी भरता है और यदि कोई कर्मचारी नियम-कायदों की बात कर दे, तो उसे मक्खी की तरह निकालकर बाहर फेंक दिया जाता है।

प्रधानमंत्री कार्यालय, सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश, मुख्यमंत्री और विभागीय मंत्री ओ.पी. चौधरी को भेजे गए एक सनसनीखेज ज्ञापन ने इस पूरे महकमे की नींद उड़ा दी है। नौ साल से विभाग को अपनी सेवाएं दे रहे कंप्यूटर ऑपरेटर चन्द्रशेखर राठौर ने जिला पंजीयक दीपक कुमार मंडावी, 'टॉपग्रेड' प्लेसमेंट एजेंसी और कार्यालय में जमे 'दस्तावेज लेखकों' के उस नापाक गठजोड़ की पोल खोल दी है, जो जनता की गाढ़ी कमाई को दीमक की तरह चाट रहा है।

वाहवाही के शोर में 'बंधुआ मजदूरी' का सच

विवाद की जड़ में है एक अफसरशाही का वह विकृत चेहरा, जो मातहतों को इंसान नहीं, गुलाम समझता है। शिकायत के मुताबिक, 18-19 जुलाई 2025 को नवीन कार्यालयों (पुसौर व सरिया) की शिफ्टिंग के दौरान ऑपरेटर चन्द्रशेखर से छुट्टी के दिन भूखे-प्यासे रात-दिन काम लिया गया। जब इस अमानवीय बर्ताव के खिलाफ ऑपरेटर ने अपनी आवाज उठाई और अधिकारी को पद की गरिमा की याद दिलाई, तो 'साहब' का ईगो आहत हो गया। यहीं से एक ईमानदार कर्मचारी को रास्ते से हटाने की साजिश रची गई।

दस्तावेज लेखक: दलाली की मुख्य धुरी

ज्ञापन में स्पष्ट आरोप है कि पंजीयन कार्यालयों में असल सत्ता रजिस्ट्रार की नहीं, बल्कि उन 'दस्तावेज लेखकों' की चलती है, जो जनता को लूटकर साहबों तक कमीशन का मोटा लिफाफा पहुंचाते हैं। ऑपरेटर ने जब इनके भ्रष्टाचार और बायोमेट्रिक व सीसीटीवी कैमरों की मांग की, तो इन्हीं दलालों से उसके खिलाफ फर्जी शिकायतें लिखवाई गईं। हद तो तब हो गई जब नियम-कायदों को ताक पर रखकर एक पक्षकार के गोपनीय पंजीयन दस्तावेजों को बाहर सार्वजनिक कर दिया गया।

2 से 4 लाख की 'नौकरी मंडी' और प्लेसमेंट कंपनी का खेल

इस पूरे खेल में 'टॉपग्रेड मेनपॉवर एंड सिक्योरिटी सर्विस' नामक प्लेसमेंट एजेंसी की भूमिका बेहद संदिग्ध है। आरोप है कि महानिरीक्षक कार्यालय से आए एक कथित 'फोन कॉल' का हवाला देकर ऑपरेटर को बिना किसी जांच, बिना पक्ष सुने 8 सितंबर को रातों-रात निकाल दिया गया। ज्ञापन में यह भी दावा किया गया है कि इस कंपनी द्वारा पंजीयन कार्यालयों में नियुक्ति के नाम पर 2 से 4 लाख रुपये की अवैध वसूली की जा रही है। जहां योग्यता नहीं, बल्कि कमीशन और सफेदपोशों की सिफारिशें काम कर रही हैं।

सिस्टम को ऑपरेटर की सीधी चुनौती:

पिछले 6 महीनों से बेरोजगारी और मानसिक प्रताड़ना का दंश झेल रहे इस ऑपरेटर ने सीधे सरकार और न्यायालय को चुनौती दी है— "यदि मेरी बातों में सच्चाई नहीं है, तो महज 1 वर्ष के पंजीकृत दस्तावेजों का निष्पक्ष ऑडिट करवा लिया जाए। सारी सच्चाई सामने आ जाएगी।"

उठते गंभीर सवाल:

• कलेक्टर परिसर में खुली लूट: जिस परिसर में जिले के मुखिया बैठते हैं, वहां इतना बड़ा सिंडिकेट बिना राजनीतिक या उच्च स्तरीय संरक्षण के कैसे फल-फूल रहा है?

• जांच से परहेज क्यों? जब एक कर्मचारी शपथ पत्र और दस्तावेजों के साथ प्रधानमंत्री से लेकर श्रमायुक्त तक दस्तक दे चुका है, तो विभाग ऑडिट कराने से क्यों कतरा रहा है?

• कैसा है यह बदलाव? रजिस्ट्री प्रक्रिया में हुए बदलावों का फायदा आखिर किसे मिल रहा है— जनता को या कमीशनखोरों को?

आज सवाल सिर्फ चन्द्रशेखर राठौर की नौकरी का नहीं है, सवाल उस 'सिस्टम' का है जो भ्रष्टाचार का विरोध करने वालों को कुचल देता है। अगर सुशासन केवल फाइलों और विज्ञापनों का शब्द नहीं है, तो इस मामले की उच्च स्तरीय जांच होनी चाहिए। वरना आम जनता यही समझेगी कि भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टॉलरेंस का नारा, सिर्फ एक नारा ही है। अब गेंद सीधे सरकार और प्रशासन के पाले में है।

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