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मध्य-पूर्व युद्ध का असर: दक्षिण-पूर्व एशिया के धान खेतों पर मंडराया खाद और ईंधन संकट

मध्य-पूर्व में जारी युद्ध का असर अब सीधे दुनिया के सबसे बड़े धान उत्पादक क्षेत्रों में दिखाई देने लगा है। दक्षिण-पूर्व एशिया के कई हिस्सों में कटाई के लिए तैयार धान के खेत खाली पड़े हैं, जबकि हजारों किसान अगली फसल की बुवाई टालने या पूरी तरह छोड़ने पर मजबूर हो रहे हैं। वजह है डीजल और उर्वरकों की बेतहाशा बढ़ती कीमतें, जिसने खेती की लागत को असहनीय स्तर तक पहुंचा दिया है।

थाईलैंड, वियतनाम, इंडोनेशिया और आसपास के देशों में करोड़ों छोटे किसान सस्ती खाद और ईंधन जुटाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। ट्रैक्टर चलाने, सिंचाई पंपों को सक्रिय रखने और धान रोपाई मशीनों के इस्तेमाल के लिए डीजल अब इतना महंगा हो चुका है कि कई किसान खेतों में खड़ी फसल को काटने तक से पीछे हट रहे हैं। थाईलैंड के कुछ इलाकों में तो हालात ऐसे हैं कि किसान कटाई की लागत फसल की कीमत से ज्यादा पड़ने के कारण धान को खेत में ही छोड़ दे रहे हैं।

यह संकट केवल खेती तक सीमित नहीं है, बल्कि वैश्विक व्यापार पर पड़े गहरे असर की भी चेतावनी है। ईरान में छह हफ्तों से जारी युद्ध ने तेल बाजार को झकझोर दिया है, जिससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ईंधन की कीमतें उछल गई हैं। इसके साथ ही हॉर्मुज जलडमरूमध्य के लगभग बंद होने जैसी स्थिति ने उर्वरक और ईंधन आपूर्ति की सबसे महत्वपूर्ण समुद्री राह को बुरी तरह प्रभावित किया है।

एशिया, जो इस मार्ग पर भारी निर्भर है, सबसे ज्यादा दबाव झेल रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर यह स्थिति लंबे समय तक बनी रही, तो आने वाले महीनों में चावल उत्पादन में गिरावट और खाद्य संकट का खतरा और गहरा सकता है। दुनिया की बड़ी आबादी के लिए मुख्य भोजन माने जाने वाले चावल की सप्लाई प्रभावित हुई, तो इसका असर केवल किसानों पर नहीं बल्कि वैश्विक खाद्य सुरक्षा पर भी साफ दिखाई देगा।

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