"बिहार में स्वास्थ्य सुधार की दिशा में एक साहसिक कदम"
" डॉक्टरों की निजी प्रैक्टिस पर रोक:
"क्या बिहार की सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था की तकदीर बदलेगी?
विजय कुमार, वरिष्ठ पत्रकार
पटना: बिहार सरकार ने स्वास्थ्य विभाग के माध्यम से एक ऐसा निर्णय लिया है जिसकी चर्चा दशकों से हो रही थी, लेकिन राजनैतिक इच्छाशक्ति की कमी के कारण यह फाइलों में दबा था।
'सात निश्चय-3' के तहत सरकारी डॉक्टरों की निजी प्रैक्टिस पर पूर्ण प्रतिबंध लगाना राज्य की चरमराती सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था को आईसीयू से बाहर निकालने की एक गंभीर कोशिश नजर आती है।
व्यवस्था में सुधार की नींव:
अक्सर यह शिकायत रहती थी कि सरकारी डॉक्टर अस्पतालों से नदारद रहकर अपने निजी क्लीनिकों को प्राथमिकता देते हैं।
इससे गरीब मरीज, जो पूरी तरह सरकारी सुविधाओं पर निर्भर हैं, बिना इलाज के रह जाते थे। नए संकल्प पत्र के अनुसार, अब एलोपैथिक डॉक्टर और चिकित्सा शिक्षक केवल सरकारी संस्थानों में ही अपनी सेवा दे सकेंगे।
सरकार ने इसके बदले उन्हें 'नॉन-प्रैक्टिस अलाउंस' (NPA) देने का वादा किया है, जो डॉक्टरों के वित्तीय हितों की रक्षा के लिए जरूरी भी है।
चुनौतियां और संभावनाएं:
यह कदम जितना सराहनीय है, इसका कार्यान्वयन उतना ही चुनौतीपूर्ण होगा।
क्या सरकार केवल भत्ते के दम पर डॉक्टरों को निजी क्लीनिकों की मोटी कमाई से दूर रख पाएगी?
इसके लिए सख्त निगरानी और जिला स्तर पर पारदर्शी ऑडिट की आवश्यकता होगी। साथ ही, ग्रामीण क्षेत्रों में बुनियादी ढांचे और दवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करना भी अनिवार्य है, ताकि डॉक्टर वहां काम करने के लिए प्रेरित हो सकें।
निष्कर्ष:
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के 'सुलभ स्वास्थ्य, सुरक्षित जीवन' के विजन को धरातल पर उतारने के लिए यह एक 'सर्जिकल स्ट्राइक' जैसा कदम है।
यदि यह नीति सफलतापूर्वक लागू होती है, तो न केवल सरकारी अस्पतालों पर जनता का भरोसा लौटेगा, बल्कि बिहार अन्य राज्यों के लिए भी एक मिसाल पेश कर सकता है।
अब गेंद स्वास्थ्य विभाग और डॉक्टरों के पाले में है कि वे इस बदलाव को किस भावना से स्वीकार करते हैं।