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कविता: एकलव्य जैसा शिष्य न मिलेगा


एकलव्य जैसा शिष्य न मिलेगा,
जिसमें गुरु के प्रति मान था,
दूर रहकर भी जिसने सीखा,
सच्चा उसका ध्यान था।

वन की गोद में बैठ अकेला,
धनुष-बाण को साधा था,
मिट्टी की मूर्ति बनाकर गुरु की,
ज्ञान का दीप जलाया था।

ना आश्रम, ना राजसी शिक्षा,
ना कोई सुख-सुविधा थी,
फिर भी तप, त्याग और श्रम से,
उसकी साधना सिधा थी।

गुरु की छाया बिना ही जिसने,
खुद को योग्य बनाया था,
हर तीर में, हर निशाने में,
अपना जीवन लगाया था।

जब गुरु ने मांगी गुरु-दक्षिणा,
क्षण भर भी ना सोचा था,
अंगूठा काट अर्पित कर दिया,
भक्ति का सागर रोया था।

एकलव्य जैसा त्याग न देखा,
ना ऐसी कोई मिसाल,
गुरु के चरणों में समर्पण,
था उसका सबसे बड़ा कमाल।

ना शिकायत, ना कोई क्रोध,
ना मन में कोई सवाल,
बस गुरु की आज्ञा मानी,
यही था उसका कमाल।

एकलव्य जैसा शिष्य न मिलेगा,
इतिहास यही बताता है,
सच्ची लगन और निष्ठा से,
इंसान महान बन जाता है।

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