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कविता: मोल नहीं अब इंसान का


मोल नहीं अब इंसान का,
देखो कैसा दौर चला,
रिश्तों की इस भीड़ में अब,
हर दिल जैसे चोर बना।

पैसों की चमक में खोकर,
भूल गए हम प्यार सभी,
अपनों से ही दूर हुए हैं,
छूट गई है यारगी।

सच की कीमत घटती जाए,
झूठ यहाँ अब शान बना,
मोल नहीं अब इंसान का,
बस दौलत पहचान बना।

दिल में नर्मी कम होती है,
नफ़रत का है शोर बड़ा,
इंसानियत रोती बैठी,
स्वार्थ का है जोर बड़ा।

फिर भी उम्मीदें जिंदा हैं,
कहीं न कहीं एक दीया,
जो मानवता को बचा सके,
बन जाए फिर से जग जिया।

आओ मिलकर कसम ये खाएँ,
प्यार का दीप जलाएँ हम,
इंसानियत को फिर से लाकर,
मानव को इंसान बनाएँ हम।

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