कविता: माँ दर्पण है मेरे मन का
माँ दर्पण है मेरे मन का,
मेरी हर खुशी का ठिकाना है।
मैं जो भी हूँ, जैसा भी हूँ,
उसका ही दिया हुआ ताना-बाना है।
जब मैं रोया, वो भी रोई,
मेरी मुस्कान में अपनी दुनिया खोई।
लोरी गाकर जिसने मुझे सुलाया,
खुद जागकर मुझे चैन की नींद सुलाया।
मेरी गलतियों को वो हंसकर भुला देती है,
रुठूँ जो मैं, तो पल में मना लेती है।
उसके आँचल में है स्वर्ग सा सुख,
मिट जाते हैं उसे देखकर सारे दुःख।
ईश्वर का रूप है माँ की ममता,
नहीं है इस जग में इसकी कोई समता।
माँ दर्पण है मेरे मन का,
वही आधार है मेरे जीवन का।