मुफ़्तखोरी की संस्कृति: 'सोने की चिड़िया' के पंखों में लगती दीमक ।
"राम चंद्र कह गए सिया से ऐसा कलजुग आएगा,
हंस चुगेगा दाना-दुनका, कौवा मोती खाएगा।"
ये पंक्तियाँ आज के भारत की विडंबना पर सटीक बैठती हैं। जहाँ एक ओर भारत विश्व की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनकर उभर रहा है, वहीं दूसरी ओर 'मुफ़्तखोरी' (Freebie Culture) की दीमक हमारे समाज की कार्यक्षमता और पुरुषार्थ को भीतर ही भीतर खोखला कर रही है। किसी भी राष्ट्र की नियति उसके नागरिकों के पसीने से लिखी जाती है, खैरात की बैसाखियों से नहीं।
वैश्विक संकट और भारतीय अर्थव्यवस्था का अंतर्विरोध है कि आज जब दुनिया के विकसित देश युद्ध, ऊर्जा संकट और कच्चे माल के अभाव में अपनी फैक्टरियां बंद करने को मजबूर हैं, तब भारत अपनी विशाल युवा शक्ति के दम पर दुनिया की उम्मीद बना हुआ है। लेकिन यह स्थिरता एक भ्रम सिद्ध हो सकती है, यदि हम अपनी आबादी के एक बड़े हिस्से को 'अकर्मण्यता' का अभ्यस्त बना दें। सवाल यह है कि यह मुफ़्त का वितरण कब तक चलेगा? क्या हम तब जागेंगे जब हमारी स्थिति भी पड़ोसी देशों—श्रीलंका, पाकिस्तान या बांग्लादेश—जैसी आर्थिक बदहाली की कगार पर पहुँच जाएगी?
ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर प्रहार: बिहार का जीवंत उदाहरण बिहार के समस्तीपुर (शाहपुर पटोरी) की स्थिति आज पूरे ग्रामीण भारत की व्यथा है। कृषि प्रधान क्षेत्रों में आज खेतों में गेहूँ काटने के लिए मजदूर नहीं मिल रहे। जब सरकारी योजनाओं के माध्यम से बिना श्रम किए पेट भरने का साधन उपलब्ध हो, तो खेतों में पसीना बहाने की प्रेरणा समाप्त हो जाती है।
श्रम की कमी ने मजदूरी की दरों को तर्कहीन बना दिया है। जो श्रमिक उपलब्ध हैं, वे मनमानी मजदूरी मांग रहे हैं, जिससे किसान और छोटे उद्यमी कर्ज के दलदल में धंसते जा रहे हैं। यह "मुफ्त अनाज" आज हमारी ग्रामीण आत्मनिर्भरता का गला घोंट रहा है।
शिक्षित युवा बनाम 'रेवड़ी कल्चर:
देश का सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह है कि एक पढ़ा-लिखा युवा डिग्री लेकर रोजगार के लिए दर-दर भटक रहा है और टैक्स के बोझ तले दबा है। दूसरी ओर, एक सक्षम वर्ग बिना किसी राष्ट्र-निर्माण में योगदान दिए केवल सरकारी खजाने पर निर्भर है। यह "समानता" नहीं, बल्कि राष्ट्र के प्रति "अन्याय" है।
जब एक कर्मशील युवा देखता है कि उसकी मेहनत की कमाई का हिस्सा उन लोगों को खिलाने में व्यर्थ हो रहा है जो काम करने में समर्थ होकर भी निठल्ले हैं, तो उसका मनोबल टूटना स्वाभाविक है। यह असंतोष भविष्य के किसी बड़े सामाजिक विद्रोह की नींव रख रहा है।
भविष्य की चेतावनी: विनाश की आहट
माननीय उच्चतम न्यायालय ने भी 'रेवड़ी कल्चर' पर गंभीर चिंता जताई है। यदि यह व्यवस्था जारी रही, तो हम दो बड़े खतरों की ओर बढ़ रहे हैं:
सामाजिक गृह-युद्ध: मेहनत करने वाले युवाओं और मुफ़्त की सुविधाओं पर पलने वाले वर्ग के बीच की खाई इतनी बढ़ जाएगी कि यह विद्रोह का रूप ले सकती है, जैसा कि हमने हाल के वर्षों में कुछ पड़ोसी देशों में देखा है।
आर्थिक दिवालियापन: जब खजाना केवल वोट बैंक की तुष्टि के लिए लुटाया जाएगा, तो बुनियादी ढांचे (Infrastructure) और विकास कार्यों के लिए धन नहीं बचेगा। विकास का पहिया थमते ही 'सोने की चिड़िया' पिंजरे में कैद होकर दम तोड़ देगी।
सत्ता की लोलुपता में सरकारें तात्कालिक लाभ की योजनाएं तो ले आती हैं, लेकिन एक सजग समाज के रूप में हमें यह समझना होगा कि "बैठकर खाने वाला समाज कभी विश्व गुरु नहीं बन सकता।" राष्ट्र का निर्माण 'दान' से नहीं, बल्कि 'योगदान' से होता है।
'सोने की चिड़िया' के गौरव को पुनर्स्थापित करने के लिए हमें मुफ़्तखोरी की बेड़ियों को काटकर 'श्रम' के खुले आसमान में उड़ना ही होगा। अन्यथा, इतिहास गवाह है कि जो राष्ट्र अपने पुरुषार्थ को विस्मृत कर देते हैं, उनका अस्तित्व केवल मानचित्रों तक सीमित रह जाता है।
"कर्म ही पूजा है" —इस मंत्र को केवल दीवारों पर लिखने के बजाय, हमें इसे अपनी कार्यशैली में उतारना होगा। यही समय की पुकार है और यही राष्ट्र की सुरक्षा का एकमात्र मार्ग है।
मनीष सिंह
शाहपुर पटोरी
@ManishSingh_PT