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मृत्यु भोज नहीं अभिशाप

मृत्यु भोज नहीं, अभिशाप है — एक जागरूकता अभियान
मृत्यु भोज जैसी कुप्रथा को अब समाज समझने लगा है। यह परंपरा नहीं, बल्कि एक अभिशाप है, जिसने वर्षों तक दुखी और कमजोर परिवारों पर अतिरिक्त बोझ डाला है। किसी के घर में दुख का समय हो, और उसी समय उस परिवार पर भोज का दबाव डालना—यह संवेदनहीनता का सबसे बड़ा उदाहरण है।
यादव परिवारों ने इस कुप्रथा का विरोध करते हुए “मृत्यु भोज” को “गिद्ध भोज” मानकर इसका बहिष्कार शुरू किया है। यह एक साहसिक और समाज सुधार की दिशा में बड़ा कदम है। अब समय आ गया है कि हम दुख में साथ दें, न कि किसी के हालात का फायदा उठाकर उसे और संकट में डालें।
आप सभी से निवेदन है कि इस जागरूकता अभियान में शामिल हों, कार्यक्रम में आएं, देखें कि कैसे एक नई सोच के साथ समाज बदल रहा है, और अपने सुझाव देकर इस पहल को और मजबूत बनाएं।
हमें ऐसा समाज बनाना है जो उपकार, परोपकार और सरोकार से प्रेरित हो—यही सच्चा मार्ग है, यही श्रीकृष्ण का उद्देश्य है।
आइए, मिलकर इस कुप्रथा को खत्म करें। मृत्यु भोज का बहिष्कार करें, मानवता को अपनाएं।
— आरके सिंह

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