PIL खत्म करने की केंद्र की मांग से कानूनी हलकों में बहस तेज, सुप्रीम कोर्ट ने कहा- अब पहले से ज्यादा सतर्क हैं अदालतें
नई दिल्ली: जनहित याचिका यानी PIL (पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन) की व्यवस्था को लेकर सुप्रीम कोर्ट में बड़ी बहस छिड़ गई है। केंद्र सरकार ने अदालत से जोरदार मांग करते हुए कहा कि मौजूदा डिजिटल दौर में PIL जैसी असाधारण संवैधानिक व्यवस्था अब अप्रासंगिक होती जा रही है और इसे समाप्त करने पर विचार होना चाहिए। 
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सुप्रीम कोर्ट से कहा कि यह व्यवस्था कभी गरीबों, कमजोर और असहाय लोगों को न्याय दिलाने के लिए शुरू की गई थी, लेकिन अब ई-फाइलिंग, ऑनलाइन सुनवाई और कानूनी सहायता केंद्रों जैसी आधुनिक सुविधाओं के चलते कोई भी व्यक्ति सीधे अदालत तक पहुंच सकता है। ऐसे में PIL जैसे विशेष संवैधानिक साधन की पहले जैसी आवश्यकता नहीं रह गई है। 
केंद्र ने आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया कि 1985 में जहां सालाना करीब 25 हजार आवेदन दाखिल होते थे, वहीं 2019 तक यह संख्या 70 हजार के पार पहुंच गई। सरकार का तर्क है कि अब सामान्य पत्र या शिकायत को भी अदालत कई बार याचिका के रूप में स्वीकार कर लेती है, इसलिए विशिष्ट एजेंडा के तहत दाखिल होने वाली PIL से न्यायपालिका पर बढ़ते बोझ को कम करने का समय आ गया है। 
हालांकि, केंद्र के इस रुख पर सुप्रीम कोर्ट ने अलग राय रखी। मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने साफ कहा कि अदालत अब किसी भी PIL को स्वीकार करने में पहले से कहीं ज्यादा सतर्क है। पिछले दो दशकों में जनहित याचिकाओं की जांच के लिए कई सख्त मानक तय किए गए हैं और केवल सार्वजनिक महत्व के मामलों में ही नोटिस जारी किया जाता है। 
मुख्य न्यायाधीश ने टिप्पणी करते हुए कहा कि अब किसी भी एजेंडा के साथ अदालत तक पहुंचना आसान नहीं है, क्योंकि कोर्ट पहले याचिका के उद्देश्य, जनहित और याचिकाकर्ता की मंशा की गहन जांच करता है।
गौरतलब है कि यह अहम बहस सबरीमाला मंदिर प्रवेश मामले की सुनवाई के दौरान सामने आई। सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना ने सवाल उठाया कि किसी धार्मिक परंपरा से सीधे तौर पर जुड़े बिना कोई “अपरिचित” व्यक्ति उस परंपरा को चुनौती देने के लिए अदालत कैसे आ सकता है। उन्होंने कहा कि जो लोग सच्चे श्रद्धालु नहीं हैं, उनकी याचिकाएं शुरुआती स्तर पर ही खारिज की जानी चाहिए थीं। 
केंद्र की PIL व्यवस्था खत्म करने की मांग और सुप्रीम कोर्ट की सतर्कता वाली टिप्पणी के बाद अब कानूनी और संवैधानिक हलकों में नई बहस शुरू हो गई है कि जनहित याचिका का भविष्य क्या होगा।