"खाकी पर दाग और इंसाफ की 'कछुआ' चाल: 20 साल बाद न्याय का 'अतरी' अध्याय"
विजय कुमार , वरिष्ठ पत्रकार
पटना। भ्रष्टाचार के दीमक जब रक्षक की वर्दी में घुस जाएं, तो समाज की नींव खोखली होने लगती है।
गया जिले के अतरी थाने के पूर्व प्रभारी लाल बाबू प्रसाद का मामला इसी कड़वे सच की तस्दीक करता है।
निगरानी अन्वेषण ब्यूरो की हालिया प्रेस विज्ञप्ति न केवल एक अपराधी को सजा मिलने की सूचना है, बल्कि यह हमारी व्यवस्था के दो चेहरों को उजागर करती है: एक जो भ्रष्टाचार को बर्दाश्त नहीं करती, और दूसरी जो न्याय देने में दो दशक लगा देती है।
रक्षक जब भक्षक बना
साल 2006 का वह दौर याद कीजिए, जब अतरी के थाना प्रभारी ने न्याय की कुर्सी पर बैठकर सौदेबाजी की थी।
आरोप था कि निर्दोषों को झूठे केस में फंसाने की धमकी देकर चंद रुपयों की मांग की गई। ₹8,000 की रिश्वत की मांग और ₹6,000 की वसूली—यह राशि छोटी लग सकती है, लेकिन एक वर्दीधारी द्वारा अपने पद का दुरुपयोग कर जनता को डराना 'नैतिक दिवालियापन' की पराकाष्ठा है।
न्याय की सुस्त रफ़्तार: 2006 से 2026
इस प्रेस विज्ञप्ति का सबसे चौंकाने वाला पहलू 'समय' है। केस संख्या 62/2006 का फैसला 2026 में आता है। एक अधिकारी को दोषी सिद्ध करने में 20 साल लग गए।
इस बीच उस परिवादी (धनंजय सिंह) के संघर्ष की कल्पना कीजिए, जिसने सिस्टम से लड़ने की हिम्मत दिखाई। हालांकि, निगरानी ब्यूरो और अभियोजन पक्ष (श्री किशोर कुमार सिंह) की सराहना होनी चाहिए कि उन्होंने दो दशकों तक फाइल को दबने नहीं दिया और अंततः दोषी को सलाखों के पीछे पहुँचाया।
सजा का संदेश: 'देर है, अंधेर नहीं'
माननीय न्यायाधीश मो० रुस्तम द्वारा सुनाई गई 3 साल की सश्रम कारावास की सजा और ₹50,000 का अर्थदंड उन तमाम भ्रष्ट अधिकारियों के लिए एक चेतावनी है जो सोचते हैं कि वक्त के साथ उनके गुनाह पुराने पड़ जाएंगे। साल 2026 में अब तक 07 भ्रष्टाचार के मामलों में सजा सुनाया जाना यह संकेत देता है कि निगरानी ब्यूरो अब 'एक्शन मोड' में है।
निष्कर्ष
लाल बाबू प्रसाद को मिली सजा केवल एक व्यक्ति की हार नहीं है, बल्कि उस मानसिकता की हार है जो सत्ता और वर्दी को 'वसूली का लाइसेंस' मानती है। लेकिन सवाल फिर वही है—क्या हम भ्रष्टाचार मुक्त बिहार के लिए 20 साल का इंतजार करने को तैयार हैं? न्याय अगर त्वरित (Fast-track) हो, तभी वह प्रभावी भय पैदा कर सकता है। फिलहाल, निगरानी ब्यूरो की यह सफलता भ्रष्टाचार के खिलाफ युद्ध में एक 'बूस्टर डोज़' की तरह है।
संपादकीय दृष्टिकोण: प्रशासन को 'जीरो टॉलरेंस' की नीति के साथ-साथ न्यायिक प्रक्रियाओं में तेजी लाने की आवश्यकता है, ताकि भ्रष्टाचार के मामलों में 'जस्टिस डिलेड' को 'जस्टिस डिनाइड' न बनने दिया जाए।