सती प्रथा हीरा माता
सती प्रथा
क्षत्रिय समाज की यह प्रथा चीता-बरड़ में भी रही है। इसका उदाहरण है सूमसी (झाक गांव के प्रतिष्ठाता) के पुत्र मालाजी की शादी झाक गांव के ही निवासी दूलाजी (बोया) या जोजरा बोया की लड़की हीरां के साथ हुई। दूलाजी अपनी पुत्री को पहली जचगी के लिए पीहर ले गये। दिन पूरे होने पर पुत्र प्राप्ति हुई। दोनों तरफ खुशियां मनाई गई। कुछ समय बाद सूमसी ने अपने मालाजी को अपनी वधु को विदा कराने भेजा तथा बोयों पर कई महीनों का लगान (नेग) बाकी लाने की बात भी कही। मालाजी ने ससुराल से विदाई के साथ लगान की रकम का भी कह दिया। ससुराल वालों ने सोचा कि हमनें बेटी दे दी और अब लगान भी मांगते हैं। फिर षड़यंत्र कर उन्होंने दामाद मालाजी को मौत के घाट उतार दिया। इस कत्ल की बात सुन दोनों और हाहाकार मच गई। हीरां ने ऐसा विकराल रूप धारण किया कि हाथ में तलवार ले उसने अपने माता-पिता,चाचा-ताया, भाई-भतीजों का कत्ले आम किया और पीहर वालों को श्राप देकर "तुम्हारा (वंश का) नाश हो", अर्थात् तुम नेस्तओ-नाबूद हो जाना। तुम्हारा बीज भी बाकी न रहे। यह श्राप दे अपने पति के साथ चिता पर सती हो गई। इस सती माता हीरां का झाक में आज भी चबूतरा विद्यमान है, जहां आज भी विवाह-शादी के समय दुल्हा-दुल्हन को "धोक" दिलाई जाती है।