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170 किलोमीटर की पदयात्रा, 22 दिन का संकल्प—विधानसभा में नहीं उठी गौ माता को राज्य माता की मांग, अब चितई गोलू देवता के दरबार में न्याय की गुहार

उत्तराखंड में गौ माता को राज्य माता का संवैधानिक दर्जा दिलाने की मांग को लेकर एक लंबा और निरंतर संघर्ष सामने आया है। रामनगर के गर्जिया देवी मंदिर से शुरू हुई 170 किलोमीटर की पदयात्रा, 22 दिनों के कठिन संकल्प के बाद अल्मोड़ा स्थित चितई गोलू देवता मंदिर पहुंच चुकी है। यह यात्रा केवल आस्था नहीं, बल्कि न्याय की मांग का प्रतीक बन गई है।
इस आंदोलन की विशेष बात यह है कि यह कोई एक बार का प्रयास नहीं रहा। इससे पहले आंदोलनकारियों द्वारा लालकुआं से गर्जिया देवी मंदिर, रामनगर तक 22 दिनों की दंडवत यात्रा की गई थी। इसके अतिरिक्त हरिद्वार से देहरादून तक 15 दिनों की एक और कठिन दंडवत यात्रा भी संपन्न की गई। इतना ही नहीं, देहरादून के दीनदयाल पार्क में 5 दिनों तक अन्न और जल का पूर्ण त्याग कर तपस्या भी की गई।
इन सभी प्रयासों के बावजूद गौ माता को राज्य माता का दर्जा देने की मांग को विधानसभा पटल पर नहीं रखा गया। जबकि आंदोलनकारियों का दावा है कि विधानसभा अध्यक्ष, विधानसभा सचिव और मुख्यमंत्री को विधिवत रूप से सभी आवश्यक दस्तावेज और मांग पत्र जमा करा दिए गए थे। साथ ही 36 से अधिक विधायकों का लिखित समर्थन भी इस मांग के पक्ष में मौजूद है।
आंदोलनकारियों का आरोप है कि जनप्रतिनिधियों के समर्थन और संवैधानिक प्रक्रिया पूरी करने के बाद भी सरकार द्वारा इस मुद्दे की अनदेखी की जा रही है, जो लोकतांत्रिक व्यवस्था पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है।
अब सभी संवैधानिक और राजनीतिक प्रयासों के बाद, आंदोलनकारियों ने न्याय के देवता माने जाने वाले चितई गोलू देवता के दरबार में पहुंचकर अंतिम गुहार लगाई है। उनका कहना है कि जब व्यवस्था से न्याय नहीं मिला, तो अब उन्हें दैवीय न्याय की आशा है।
यह पूरा आंदोलन अब उत्तराखंड में एक बड़े जनआंदोलन का रूप लेता दिख रहा है, जो आने वाले समय में सामाजिक और राजनीतिक बहस का केंद्र बन सकता है।

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