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महंगी पाठ्य पुस्तकें और शिक्षा पर बढ़ता आर्थिक बोझ।

शिक्षा किसी भी समाज के विकास की आधारशिला मानी जाती है। यह न केवल व्यक्ति के ज्ञान को बढ़ाती है बल्कि उसे जीवन में आगे बढ़ने का मार्ग भी दिखाती है। लेकिन वर्तमान समय में शिक्षा का क्षेत्र धीरे-धीरे महंगा होता जा रहा है, जिसका सबसे बड़ा कारण पाठ्य पुस्तकों की बढ़ती कीमतें हैं। महंगी पाठ्य पुस्तकें आज अभिभावकों और विद्यार्थियों दोनों के लिए एक बड़ी समस्या बन चुकी हैं।

आज स्कूलों और कॉलेजों में हर साल पाठ्य पुस्तकों के नए संस्करण लागू किए जाते हैं। इसके कारण छात्रों को पुरानी किताबें इस्तेमाल करने का अवसर नहीं मिल पाता। कई निजी विद्यालय तो विशेष प्रकाशकों की किताबें ही अनिवार्य कर देते हैं, जिससे बाजार में उपलब्ध सस्ती पुस्तकों का विकल्प समाप्त हो जाता है। परिणामस्वरूप अभिभावकों को मजबूरी में महंगी किताबें खरीदनी पड़ती हैं।

गरीब और मध्यम वर्ग के परिवारों के लिए यह स्थिति और भी कठिन हो जाती है। कई बार किताबों की कीमत स्कूल फीस के बराबर या उससे भी अधिक हो जाती है। इससे बच्चों की पढ़ाई पर सीधा असर पड़ता है। आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के कुछ बच्चे केवल इसलिए पढ़ाई छोड़ देते हैं क्योंकि वे महंगी किताबें खरीदने में सक्षम नहीं होते।

सरकार ने इस समस्या को कम करने के लिए कई प्रयास किए हैं, जैसे सरकारी विद्यालयों में निशुल्क पाठ्य पुस्तकें उपलब्ध कराना और पुस्तकालय व्यवस्था को मजबूत करना। फिर भी निजी शिक्षा संस्थानों में किताबों की कीमतों पर प्रभावी नियंत्रण की आवश्यकता है।

आवश्यक है कि सरकार और शिक्षा विभाग इस दिशा में ठोस कदम उठाएं। पाठ्य पुस्तकों की कीमतों को नियंत्रित किया जाए, पुराने संस्करणों को भी उपयोग में लाने की अनुमति दी जाए तथा डिजिटल पुस्तकों और साझा पुस्तकालयों को बढ़ावा दिया जाए। इससे शिक्षा को सुलभ और किफायती बनाया जा सकता है।

अंततः यह समझना जरूरी है कि शिक्षा किसी विलासिता की वस्तु नहीं बल्कि हर बच्चे का मौलिक अधिकार है। इसलिए पाठ्य पुस्तकों को सस्ता और सुलभ बनाना समाज और सरकार दोनों की साझा जिम्मेदारी है।





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