पटोरी के ए.एन.डी. कॉलेज की बदहाली: क्या महामहिम देख पाएंगे चूने के पीछे का सच?
"जनता की, जनता द्वारा और जनता के लिए"—अब्राहम लिंकन की यह परिभाषा आज के दौर में महज़ किताबी जुमला बनकर रह गई है। जब हम अपने पड़ोसी देश नेपाल के युवा नेतृत्व की कार्यशैली को देखते हैं, जहाँ 'वीआईपी कल्चर' को जड़ से मिटाने की कोशिश हो रही है, तो उम्मीद जागती है। लेकिन इसके उलट, लोकतंत्र की जननी कहे जाने वाले भारत में यह परिभाषा अक्सर उपहास का कारण बनती दिखती है।
समस्तीपुर जिले का शाहपुर पटोरी अनुमंडल आज कल चर्चा में है। कारण विकास नहीं, बल्कि महामहिम राज्यपाल महोदय का ए.एन.डी. कॉलेज (AND College) में आगमन है। इस एक दिन के कार्यक्रम के लिए समूचा प्रशासनिक अमला हफ्ते भर से एड़ियां रगड़ रहा है। बरसों से जर्जर पड़ी शाहपुर पटोरी-जंदाहा मुख्य सड़क, जो आम जनता की कमर तोड़ रही थी, रातों-रात 'पिच' कर दी गई।
सड़क के किनारे ब्लीचिंग पाउडर का छिड़काव और वर्दी में मुस्तैद कर्मचारी यह आभास करा रहे हैं जैसे पटोरी में रामराज्य आ गया हो। लेकिन स्थानीय नागरिक जानते हैं कि यह चमक महज़ महामहिम की गाड़ियों के काफिले को हिचकोलों से बचाने के लिए है। जैसे ही वीआईपी की धूल उड़ेगी, यह विकास भी धूल में मिल जाएगा।
टैक्सपेयर का पैसा और लालफीताशाही का तमाशा अब
सवाल यह उठता है कि जिस टैक्सपेयर के पैसे से यह लाव-लश्कर तैयार किया गया है, उसके लिए यह तंत्र इतना क्रूर क्यों है?
क्या सड़क बनने के लिए किसी बड़े पद का आगमन अनिवार्य है?
क्या आम जनता का पसीना, अधिकारियों को पसीने बहाने के लिए मजबूर नहीं कर सकता?
आज की व्यवस्था में ब्लॉक के छोटे कर्मचारी से लेकर ऊंचे ओहदों तक बैठे लोग खुद को 'राजा' और आम नागरिक को 'याचक' समझने लगे हैं। यह स्थिति राजतंत्र से भी बदतर है, जहाँ कम से कम जवाबदेही का एक चेहरा तो होता था। यहाँ तो जवाबदेही फाइलों के ढेर और लालफीताशाही के नीचे दबी पड़ी है।
दशकों पुराने इस कॉलेज का छात्र होना गौरव की बात हो सकती थी, लेकिन यहाँ की बुनियादी सुविधाओं का अभाव और जर्जर इंफ्रास्ट्रक्चर शर्मिंदगी का विषय है। उच्च शिक्षा के लिए आज भी पटोरी के युवाओं को पलायन करना पड़ता है। क्या महामहिम, जिनके हाथों में राज्य की उच्च शिक्षा की कमान है, इस कॉलेज की बदहाली को देख पाएंगे? या फिर उन्हें सिर्फ वही दिखाया जाएगा जिसे अधिकारियों ने सफेद चूने और नए डामर से ढक दिया है?
पटोरी के 'भोले' नागरिक आज तंज में कहते हैं कि
"ऐसे बड़े नेता रोज आते रहें, ताकि कम से कम सड़कों की सूरत तो बदलती रहे।"
यह वाक्य व्यवस्था के गाल पर करारा तमाचा है।
अगर लोकतंत्र वास्तव में 'जनता के लिए' है, तो प्रशासन की सक्रियता किसी वीआईपी के आने पर नहीं, बल्कि किसी आम नागरिक के दुःख को दूर करने के लिए होनी चाहिए। जब तक व्यवस्था आम आदमी को 'भिखारी' और खुद को 'विधाता' समझना बंद नहीं करेगी, तब तक लोकतंत्र का यह मूल मंत्र महज़ एक चुनावी नारा ही बना रहेगा।
मनीष सिंह
शाहपुर पटोरी
@ManishSingh_PT