अनजाने में आराधना
प्राचीन काल की बात है जब विंध्याचल के घने जंगलों में चित्रभानु नाम का एक निषाद रहता था। उसका जीवन धनुष की प्रत्यंचा और शिकार के मांस तक ही सीमित था। एक महाशिवरात्रि का दिन था लेकिन शिकारी इस पर्व से अनजान भूख से बिलखते अपने परिवार के लिए भोजन की तलाश में जंगल की खाक छान रहा था।
सूरज ढल चुका था, पर शिकारी के हाथ खाली थे। थका हारा वह एक जलाशय के किनारे ऊंचे बिल्व वृक्ष (बेल के पेड़) पर चढ़ गया। उसे लगा कि रात के अंधेरे में कोई न कोई जानवर पानी पीने जरूर आएगा। उस पेड़ के नीचे घास फूस और सूखी पत्तियों से ढका हुआ एक प्राचीन शिवलिंग था जिससे वह अनभिज्ञ था। पेड़ पर अपनी जगह बनाते समय शिकारी ने अनजाने में कुछ टहनियां तोड़ीं जिससे ताजे बेलपत्र शिवलिंग पर जा गिरे। प्यास के कारण उसका गला सूख रहा था जिससे उसका अनचाहा 'उपवास' हो गया और रात भर जगने के कारण 'जागरण' भी।रात के सन्नाटे को चीरती हुई एक गर्भिणी मृगी तालाब की ओर आई। शिकारी ने जैसे ही बाण साधा मृगी की दृष्टि उस पर पड़ी। वह थकी हुई आवाज में बोली "हे शिकारी! मेरी देह में एक नन्ही जान पल रही है। यदि तुम मुझे मारोगे तो एक साथ दो हत्याओं का पाप लगेगा। मुझे प्रसव करने दो फिर मैं स्वयं तुम्हारे पास लौट आऊंगी शिकारी का कठोर मन पहली बार किसी जीव की तर्क पूर्ण वाणी सुनकर पसीजा। उसने धनुष ढीला कर दिया और मृगी ओझल हो गई। इस हलचल में कुछ और बेलपत्र शिवलिंग पर गिर गए।कुछ समय बाद एक और मृगी वहां आई। जैसे ही शिकारी ने निशाना लगाया वह कातर स्वर में बोली "हे व्याध! मैं अपने प्रिय की खोज में भटक रही हूं। मुझे एक बार अपने स्वामी से मिल लेने दो फिर मेरा यह शरीर तुम्हारा ही भोजन बनेगा। हैरान होकर शिकारी ने उसे भी जाने दिया। रात का तीसरा पहर आया तो एक तीसरी मृगी अपने बच्चों के साथ दिखाई दी। शिकारी अब क्रोधित था "दो बार धोखा खा चुका हूं, अब और नहीं!लेकिन मृगी ने अपनी ममता की दुहाई दी "इन नन्हे बच्चों को इनके पिता को सौंप आऊं फिर मैं मौत को गले लगाने लौट आऊंगी। एक मां का विश्वास मत तोड़ो।" शिकारी का पत्थर जैसा दिल पिघलने लगा था। अनजाने में हो रही शिव पूजा और उपवास ने उसके भीतर के तमोगुण को नष्ट करना शुरू कर दिया था। उसने उसे भी जीवनदान दे दिया।भोर होने को थी। तभी एक विशाल और हष्ट पुष्ट मृग ( हिरण ) वहां आया। शिकारी ने सोचा आज का दिन तो खाली गया पर इस एक मृग से मेरा पूरा परिवार तृप्त हो जाएगा।जैसे ही उसने प्रत्यंचा खींची मृग ने शांत भाव से कहा "हे शिकारी! यदि तुमने मेरी तीनों पत्नियों और बच्चों को मार दिया है, तो मुझे भी मार दो ताकि मैं उनके बिना विरह न सहूं। और यदि तुमने उन्हें छोड़ दिया है, तो मुझे भी क्षण भर का समय दो। मैं उनसे मिलकर और उन्हें सांत्वना देकर वापस आता हूं।"
मृग की सत्यनिष्ठा और परिवार के प्रति प्रेम देखकर शिकारी सन्न रह गया। पूरी रात का घटनाचक्र उसकी आंखों के सामने घूम गया। उसे बोध हुआ कि वह तुच्छ स्वार्थ के लिए किन महान प्राणियों का वध करने जा रहा था। तभी चमत्कार हुआ। वह मृग अपने पूरे परिवार ( तीनों पत्नियों और बच्चों ) के साथ वहां उपस्थित हो गया। सबने एक स्वर में कहा *हम अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार हाजिर हैं, अब तुम अपना शिकार कर सकते हो।*
पशुओं की ऐसी सत्यवादिता और त्याग देखकर शिकारी की आंखों से आंसुओं की धारा बह निकली। उसका हिंसक हृदय अब करुणा का सागर बन चुका था। उसने धनुष-बाण फेंक दिए और भगवान शिव के चरणों में गिर पड़ा। भगवान शंकर उसकी अनजानी लेकिन निस्वार्थ भक्ति से प्रसन्न हुए और उसे साक्षात दर्शन दिए। शिकारी का जीवन धन्य हो गया। देवताओं ने पुष्प वर्षा की और अंत में वह शिकारी और वह मृग परिवार, दोनों ही अपनी अपनी उच्च योनियों और मोक्ष को प्राप्त हुए।