"लोकतंत्र के चौथे स्तंभ पर प्रहार और सुरक्षा की चुनौती"
घटना का संदर्भ और पत्रकारों की एकजुटता:
विजय कुमार, वरिष्ठ पत्रकार
शेरघाटी में हाल ही में पत्रकार के साथ हुई धक्का-मुक्की और गाली-गलौज की घटना केवल एक व्यक्ति के विरुद्ध अपराध नहीं है, बल्कि यह लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की स्वतंत्रता पर सीधा हमला है।
जब समाज की विसंगतियों को उजागर करने वाली 'कलम' असुरक्षित महसूस करने लगे, तो समझ लेना चाहिए कि अराजक तत्वों का मनोबल व्यवस्था की ढिलाई के कारण बढ़ रहा है।
भाजपा के स्थापना दिवस जैसे सार्वजनिक कार्यक्रम की कवरेज के दौरान एक प्रतिष्ठित अख़बार "प्रभात ख़बर" के पत्रकार नवीन मिश्रा के साथ जिस तरह का व्यवहार किया गया, वह निंदनीय है।
रेलवे काउंटर से जुड़े कथित दलालों द्वारा किया गया यह दुर्व्यवहार यह दर्शाता है कि भ्रष्टाचार में लिप्त लोगों के मन से कानून का भय समाप्त होता जा रहा है।
मंगलवार को श्रमजीवी पत्रकार यूनियन के बैनर तले 50 से अधिक पत्रकारों का एकजुट होना एक शुभ संकेत है।
यह संदेश साफ है:
"कलम की आवाज को डरा-धमका कर दबाया नहीं जा सकता।"
प्रशासनिक जिम्मेदारी और सुरक्षा का प्रश्न:
बैठक के बाद पत्रकारों के प्रतिनिधिमंडल ने थानाध्यक्ष से मिलकर दोषियों की गिरफ्तारी की मांग की है। हालांकि प्रशासन ने कार्रवाई का आश्वासन दिया है, लेकिन प्रश्न यह उठता है कि:
क्या आश्वासन धरातल पर उतरेगा?
क्या पत्रकारों के लिए कार्यक्षेत्र में भयमुक्त वातावरण सुनिश्चित किया जाएगा?
"पत्रकार समाज का वह दर्पण है जो कड़वा सच दिखाने का साहस रखता है। यदि दर्पण को ही तोड़ने का प्रयास किया जाएगा, तो समाज की वास्तविकता धुंधली पड़ जाएगी।"
दलालों का बढ़ता दुस्साहस
इस घटना का सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि इसमें 'दलालों' की संलिप्तता सामने आई है।
सार्वजनिक संस्थानों में पैर पसार चुके ये असामाजिक तत्व तब और उग्र हो जाते हैं जब कोई पत्रकार उनकी अवैध गतिविधियों पर रोशनी डालता है।
राजनीतिक दलों (राजद, कांग्रेस, भाजपा) द्वारा इस घटना की निंदा करना स्वागत योग्य है, परंतु केवल निंदा काफी नहीं है। राजनीतिक संरक्षण प्राप्त अपराधियों को चिन्हित कर उन पर अंकुश लगाना भी राजनीति की ही जिम्मेदारी है।
निष्कर्ष
प्रशासन को यह समझना होगा कि पत्रकार की सुरक्षा केवल एक व्यक्ति की सुरक्षा नहीं, बल्कि अभिव्यक्ति की आजादी की सुरक्षा है। शेरघाटी की इस घटना में यदि दोषियों पर कड़ी और त्वरित कार्रवाई नहीं होती है, तो यह लोकतंत्र के लिए एक काला अध्याय साबित होगा।
वक्त की मांग है कि प्रशासन 'विधि सम्मत कार्रवाई' के अपने वादे को जल्द से जल्द पूरा करे और यह सुनिश्चित करे कि भविष्य में किसी भी 'कलमकार' को अपना कर्तव्य निभाते समय अपमानित न होना पड़े।