बेरमो मैं प्राइवेट स्कूल की लुट शिक्षा नहीं व्यापार चल रहा हैं यहां। शासन और प्रशासन की मिली भगत न कोई नियम मानेंगे और न कोई चलेगा झारखण में
बेरमो के निजी स्कूलों में 'शिक्षा' के नाम पर अवैध वसूली का खेल, अभिभावकों की जेब पर भारी पड़ रहा री-एडमिशन और महंगी किताबें
बेरमो
नए शैक्षणिक सत्र की शुरुआत के साथ ही बेरमो कोयलांचल के निजी स्कूलों में अभिभावकों के दोहन का सिलसिला एक बार फिर शुरू हो गया है। शिक्षा के अधिकार (RTE) के दावों के बीच, क्षेत्र के नामी गिरामी स्कूलों द्वारा 'री-एडमिशन' और 'डेवलपमेंट चार्ज' के नाम पर मोटी रकम वसूली जा रही है, जिससे मध्यम और निम्न वर्गीय परिवारों की कमर टूट गई है।
अभिभावकों ने गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि एक प्राइवेट स्कूल की स्थिति काफी चिंताजनक है। यहाँ बच्चों को किताबें तब तक नहीं दी जा रही हैं, जब तक कि 'री-एडमिशन' की प्रक्रिया पूरी न कर ली जाए। इस मनमानी के कारण कई बच्चों की पढ़ाई बाधित होने का खतरा पैदा हो गया है। अभिभावकों का सवाल है कि हर साल एक ही स्कूल में पढ़ रहे बच्चे से पुन: नामांकन शुल्क लेना कहाँ तक जायज है? हालांकि सरकारी नियमों के अनुसार हर साल री-एडमिशन लेना गलत है।
यही हाल एक और प्राइवेट स्कूल का भी बताया जा रहा है। यहाँ की किताबों की कीमतें इतनी अधिक हैं कि आम अभिभावक इन्हें खरीदने में असमर्थ महसूस कर रहे हैं। स्कूलों द्वारा चुनिंदा दुकानों से ही महंगी सामग्री खरीदने का अदृश्य दबाव बनाया जा रहा है, जो सीधे तौर पर नियमों का उल्लंघन है। साथ ही नया स्कूल यूनिफार्म के नाम पर दुकानदार मनमाना कीमत वसूल कर रहे है।
हैरानी की बात यह है कि निजी स्कूलों की इस खुली मनमानी पर शिक्षा विभाग और स्थानीय प्रशासनिक अधिकारी अभी तक मौन साधे हुए हैं। अधिकारियों की चुप्पी पर सवाल उठाते हुए अभिभावकों ने कहा कि क्या प्रशासन इन स्कूलों के रसूख के आगे नतमस्तक है? अभिभावकों की मांग की है कि जिला प्रशासन और शिक्षा विभाग को इस मामले में तुरंत हस्तक्षेप करना चाहिए। री-एडमिशन के नाम पर हो रही अवैध वसूली पर रोक लगे और किताबों के दाम नियंत्रित किए जाएं ताकि बच्चों को उनके 'शिक्षा के अधिकार' से वंचित न होना पड़े।
मजदूरी करने वाले एक पिता ने कहा कि जितनी मेरी महीने की कमाई नहीं, उससे ज्यादा स्कूल ने री-एडमिशन फीस मांग ली है। क्या जिला शिक्षा पदाधिकारी (DEO) इस मामले की जांच करेंगे? या अभिभावक इसी तरह लुटते रहेंगे?
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