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करोड़ों की टैक्स चोरी का आरोप—क्या प्रशासनिक तंत्र बना मूकदर्शक?

डिंडौरी -- जिले में परिवहन व्यवस्था और प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करते हुए एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है। आवेदक वीरेन्द्र केशवानी द्वारा कलेक्टर को सौंपे गए शिकायत पत्र में आरोप लगाया गया है कि जिले के कुछ प्रभावशाली वाहन स्वामियों द्वारा वर्षों से करोड़ों रुपये के वाहन कर (टैक्स) का भुगतान नहीं किया गया, इसके बावजूद संबंधित वाहनों का संचालन धड़ल्ले से जारी है।

शिकायत पत्र में वाहन स्वामियों के नाम का उल्लेख भी किया गया है । जिनके स्वामित्व वाले कई मालवाहक वाहन बिना टैक्स जमा किए सड़कों पर दौड़ रहे हैं। आरोप है कि इन वाहनों का पंजीयन जिला परिवहन कार्यालय में होने के बावजूद, रजिस्ट्रेशन तिथि से लेकर वर्ष 2026 तक टैक्स का भुगतान नहीं किया गया, जिससे शासन को करोड़ों रुपये के राजस्व का नुकसान हुआ है।

सबसे गंभीर पहलू यह बताया जा रहा है कि बिना कर भुगतान के भी इन वाहनों को परमिट और फिटनेस प्रमाणपत्र जारी किए गए। इससे परिवहन विभाग की कार्यप्रणाली और पारदर्शिता पर सवाल खड़े हो गए हैं। क्या यह महज लापरवाही है या फिर किसी प्रकार की मिलीभगत—यह अब जांच का विषय बन गया है।

आवेदन में यह भी उल्लेख किया गया है कि कुछ एम्बुलेंस वाहनों (टाटा 407) को, जिनका शासन के साथ अनुबंध समाप्त हो चुका था, नियमों के विपरीत बॉडी कटिंग कर मालवाहक वाहनों में परिवर्तित कर दिया गया और बिना वैधानिक अनुमति के उनका व्यावसायिक उपयोग किया जा रहा है। यह न केवल नियमों का उल्लंघन है, बल्कि सुरक्षा मानकों के साथ भी गंभीर खिलवाड़ है।

शिकायतकर्ता ने यह भी आशंका जताई है कि संबंधित वाहन मालिकों के वाहन केवल डिंडौरी ही नहीं, बल्कि मंडला, शहडोल और जबलपुर जिलों में भी पंजीकृत हो सकते हैं, जहां बड़े पैमाने पर टैक्स चोरी की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता।

इस पूरे प्रकरण ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर जिम्मेदार विभाग की निगरानी व्यवस्था कितनी प्रभावी है? यदि इतने बड़े स्तर पर कर चोरी संभव है, तो आम नागरिकों से नियमों के पालन की अपेक्षा कितनी न्यायसंगत है?अब देखना यह होगा कि जिला प्रशासन इस गंभीर शिकायत पर क्या रुख अपनाता है। क्या दोषियों पर कड़ी कार्रवाई होगी और राजस्व की वसूली सुनिश्चित की जाएगी, या फिर यह मामला भी फाइलों में दबकर रह जाएगा?

फिलहाल, यह मामला प्रशासनिक पारदर्शिता, जवाबदेही और कानून के समान अनुपालन की कसौटी बनता नजर आ रहा है।

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