मानगो में नई सोच की शुरुआत: मेयर सुधा गुप्ता ने लौटाई सरकारी गाड़ी, छोड़ी सैलरी — VIP कल्चर पर सख्त संदेश
जमशेदपुर
मानगो नगर निगम की नई मेयर सुधा गुप्ता ने पदभार संभालते ही ऐसे फैसले लिए हैं, जो पूरे शहर में चर्चा का विषय बन गए हैं। उनके कदम न सिर्फ सादगी की मिसाल पेश कर रहे हैं, बल्कि सरकारी तंत्र में व्याप्त VIP कल्चर और फिजूलखर्ची पर सीधा प्रहार भी माने जा रहे हैं।
सरकारी गाड़ी लौटाई, निजी वाहन से करेंगी काम
मेयर ने अपने लिए उपलब्ध कराए गए सभी सरकारी वाहनों को तत्काल प्रभाव से वापस करने का निर्देश दिया है। उनका कहना है कि वे जनता की सेवा के लिए आई हैं, न कि सरकारी सुविधाओं का लाभ उठाने के लिए। अब वे अपने निजी वाहन से ही सभी आधिकारिक कार्य करेंगी, जिससे सरकारी संसाधनों पर अनावश्यक बोझ कम होगा।
सैलरी का त्याग, राहत कोष में जाएगी राशि
सबसे चौंकाने वाला फैसला यह रहा कि मेयर ने अपने पद का मानदेय (सैलरी) भी लेने से इनकार कर दिया है। यह पूरी राशि मुख्यमंत्री राहत कोष में जमा कराई जाएगी, ताकि जरूरतमंद लोगों की मदद हो सके। उनके इस निर्णय को समाजसेवा की मजबूत मिसाल माना जा रहा है।
ऑफिस में सादगी, VIP व्यवस्था से इनकार
मेयर ने अपने कार्यालय में किसी भी प्रकार की विशेष या VIP व्यवस्था से साफ इनकार कर दिया है। उन्होंने कहा कि एक साधारण और सादगीपूर्ण कार्यालय ही पर्याप्त है और इसके लिए अतिरिक्त फंड खर्च करना जनता के पैसे की बर्बादी होगी।
फिजूलखर्ची पर सख्त रोक
उन्होंने अधिकारियों को स्पष्ट निर्देश दिया है कि टैक्सपेयर्स के पैसे का उपयोग केवल जनहित और विकास कार्यों में ही किया जाए। दिखावे, अनावश्यक कार्यक्रमों और खर्चों पर पूरी तरह रोक लगाने को कहा गया है।
गुलदस्ता नहीं, अब पौधा या किताब
नगर निगम के कार्यक्रमों में अब पारंपरिक गुलदस्ता देने की परंपरा खत्म की जाएगी। इसके स्थान पर पौधा या किताब देकर स्वागत करने की नई पहल शुरू होगी। यह कदम पर्यावरण संरक्षण और ज्ञान को बढ़ावा देने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
सिस्टम को साफ संदेश: “जनता पहले”
मेयर ने अपने फैसलों के जरिए पूरे प्रशासनिक तंत्र को स्पष्ट संदेश दिया है कि जनता की सेवा सर्वोपरि है। उन्होंने अधिकारियों और कर्मचारियों से भी अपेक्षा की है कि वे व्यक्तिगत सुविधा से ऊपर उठकर जनहित में कार्य करें।
निष्कर्ष:
मेयर सुधा गुप्ता के ये फैसले न केवल प्रशासनिक सादगी की नई परिभाषा गढ़ रहे हैं, बल्कि यह भी दिखा रहे हैं कि यदि इच्छाशक्ति हो, तो सिस्टम में सकारात्मक बदलाव संभव है। उनके इस कदम को आम जनता के बीच व्यापक समर्थन मिल रहा है और इसे एक प्रेरणादायक पहल के रूप में देखा जा रहा है।