“रोजगार कार्यालय या प्राइवेट प्लेसमेंट एजेंसी?” 🤔
कोण्डागांव में प्लेसमेंट कैंप लगा…
396 पद निकले…
97 युवाओं ने आवेदन किया…
और आखिर में सिर्फ 25 को नौकरी मिली…
वाह! आंकड़े तो चमक रहे हैं…
लेकिन ज़रा हकीकत की परत हटाकर देखिए 👇
जिला रोजगार कार्यालय अब
“रोजगार” कम, “ठेका प्लेसमेंट सेंटर” ज्यादा लगने लगा है।
🔸 सरकारी नौकरी? — सिर्फ अखबार की सुर्खियों में
🔸 ग्राउंड पर? — प्राइवेट कंपनियों का इंटरव्यू मेला
👉 पहले यहां लोग सपनों के साथ आते थे
👉 अब लोग “गार्ड, सेल्समैन, फील्ड बॉय” बनने की लाइन में खड़े हैं
सरकारी दफ्तर में प्राइवेट नौकरी का मेला…
लगता है सिस्टम ने “रोजगार” को भी आउटसोर्स कर दिया!
रोजगार कार्यालय नहीं…
“नौकरी दिलाने का जुगाड़ केंद्र” बन गया है!
सबसे बड़ा सवाल ❓
जब सरकारी नौकरी दिलाने की जिम्मेदारी ही खत्म हो गई,
तो ये कार्यालय आखिर कर क्या रहा है?
न सत्ता को फर्क…
न विपक्ष को चिंता…
और बेरोजगार युवा?
बस आंकड़ों में “सेलेक्टेड” बनकर खुश होने को मजबूर…
“रोजगार का वादा था…
ठेका नौकरी का इंतजाम मिला!”
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