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29 साल बाद भी गूंजता है बनारस का ‘नरिया कांड’ — छात्र राजनीति के खूनी दौर की याद


वाराणसी। 6 अप्रैल 1997 की वह शाम आज भी शहर के इतिहास में काले अक्षरों में दर्ज है। लंका थाना क्षेत्र के नरिया तिराहे पर हुई ताबड़तोड़ फायरिंग ने पूरे बनारस को दहला दिया था। इस घटना ने न सिर्फ चार युवा छात्र नेताओं की जान ली, बल्कि पूर्वांचल की छात्र राजनीति को हमेशा के लिए बदल दिया।
🔹 घटना का पूरा विवरण
जानकारी के अनुसार, महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ के नवनिर्वाचित छात्रसंघ अध्यक्ष रामप्रकाश पांडेय, पूर्व अध्यक्ष सुनील राय, भोनू मल्लाह और मुन्ना राय एक मारुति कार से बीएचयू अस्पताल से लौट रहे थे। उनके साथ आचार्य राजेंद्र त्रिवेदी भी मौजूद थे।
नरिया तिराहे के पास अचानक हमलावरों ने उनकी गाड़ी को घेर लिया और AK-47 से करीब 150 राउंड फायरिंग कर दी। इस हमले में चारों छात्र नेताओं की मौके पर ही मौत हो गई।
🔹 मास्टरमाइंड और हथियार का खौफ
इस सनसनीखेज हत्याकांड का मास्टरमाइंड कुख्यात गैंगस्टर मुन्ना बजरंगी को माना गया। उस समय AK-47 जैसे आधुनिक हथियार का इस्तेमाल बेहद दुर्लभ था, जिसने पूरे क्षेत्र में भय का माहौल बना दिया।
🔹 इकलौते चश्मदीद गवाह
हमले में गंभीर रूप से घायल आचार्य राजेंद्र त्रिवेदी को कई गोलियां लगीं, लेकिन लंबी इलाज के बाद वह बच गए। आज भी वह इस घटना के जीवित गवाह हैं।
🔹 छात्र राजनीति पर असर
नरिया कांड ने यह साफ कर दिया कि छात्र राजनीति में अपराध और वर्चस्व की लड़ाई किस हद तक पहुंच चुकी थी। इसके बाद भी क्षेत्र में कई हिंसक घटनाएं सामने आईं।
29 साल बाद भी यह घटना लोगों के जेहन में जिंदा है। नरिया तिराहे से गुजरते वक्त आज भी उस दर्दनाक मंजर की याद ताजा हो जाती है।

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