स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती: राष्ट्रचेतना, धर्म और सामाजिक समरसता के अग्रदूत...
▪️भारत की आध्यात्मिक परंपरा कभी केवल पूजा-अर्चना और कर्मकांड की संकरी पगडंडी तक सिमटी नहीं रही। युग-युग में इस परंपरा ने समाज की पीड़ा को वाणी दी है, राष्ट्र के प्रश्नों पर मौन नहीं साधा, और मानवता की दिशा निर्धारित करने में अपनी निर्णायक भूमिका निभाई है। ज्योतिर्मठ बद्रीपीठ के शंकराचार्य पूज्य स्वामी श्री अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती जी इसी गौरवशाली परंपरा की सजीव कड़ी हैं — जहाँ धर्म केवल विधि-विधान का नाम नहीं, अपितु लोकमंगल का अखंड संकल्प है।
▪️गौसंरक्षण — सांस्कृतिक अस्मिता की आधारशिला
स्वामी जी ने गौहत्या-निषेध के पक्ष में सदैव निर्भीक और उदात्त स्वर उठाया है। उनकी दृष्टि में गौ केवल एक पशु नहीं, वरन् भारतीय कृषि की प्राणवायु, ग्राम्य-जीवन की धुरी और सांस्कृतिक चेतना की जीवंत प्रतीक है। वे बारंबार यह स्मरण दिलाते हैं कि गौसंरक्षण का प्रश्न किसी राजनीतिक दाँव-पेच का विषय नहीं, बल्कि राष्ट्रीय अस्मिता, करुणा और सभ्यतागत निरंतरता का सनातन प्रश्न है। जो समाज अपनी जड़ों को विस्मृत कर देता है, वह कालांतर में अपना अस्तित्व भी खो बैठता है — यही उनकी वैचारिक चेतावनी है।
▪️गंगा संरक्षण — सभ्यता की जीवनरेखा
माँ गंगा को राष्ट्रीय नदी के रूप में प्रतिष्ठित करने के पावन अभियान में स्वामी जी का अवदान अतुलनीय रहा है। गंगा केवल जल की एक धारा नहीं — वह भारतीय सभ्यता की स्मृति है, असंख्य पीढ़ियों की आस्था का तीर्थ है, और इस भूमि की चेतना का दर्पण है। स्वामी जी ने गंगा की अविरलता और निर्मलता को अपने धर्म-कर्तव्य का अंग मानकर जनजागरण का बीड़ा उठाया। उन्होंने इस संघर्ष को एक व्यक्ति या संस्था की सीमा से निकालकर व्यापक राष्ट्रीय चेतना का स्वर दिया — क्योंकि गंगा का मरण भारत की आत्मा का मरण होगा।
▪️राम जन्मभूमि — आस्था, इतिहास और दर्शन का संगम
राम जन्मभूमि के उस ऐतिहासिक न्यायिक संग्राम में, जो भारत के सर्वोच्च न्यायालय में युगों की पीड़ा और आकांक्षा को लेकर लड़ा गया, स्वामी जी का नाम श्रद्धा और प्रामाणिकता के साथ उद्धृत होता रहा। उनके वक्तव्य और शास्त्रसम्मत तर्कों ने इस विमर्श को केवल भावनात्मक आस्था की भूमि पर नहीं छोड़ा, बल्कि उसे ऐतिहासिक प्रमाण और दार्शनिक चिंतन की ऊँचाई पर प्रतिष्ठित किया। यह उनकी परंपरागत विद्वता, मेधा और नैतिक साहस का प्रमाण है।
▪️समरसता और योग्यता — संतुलित राष्ट्रनिर्माण का स्वप्न
चारों शंकराचार्यों की अनादि परंपरा सामाजिक समरसता को अपनी आत्मा में धारण करती आई है। स्वामी जी का विचार यह है कि समाज में समता और न्याय की स्थापना अनिवार्य है, किंतु शिक्षा और अवसरों में योग्यता की उपेक्षा राष्ट्र को दुर्बल करती है। उनकी दृष्टि में संतुलित और विवेकसम्मत नीति ही वह आधार-भूमि है जिस पर सशक्त राष्ट्र का भव्य प्रासाद खड़ा हो सकता है — जहाँ न्याय और उत्कृष्टता परस्पर-विरोधी नहीं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक हों।
▪️राष्ट्रहित बनाम राजनीतिक श्रेय — सिद्धांत की सर्वोच्चता
समकालीन राजनीति में अनेक दल और नेता धार्मिक एवं सांस्कृतिक प्रश्नों पर अपना-अपना पक्ष रखते हैं। किंतु स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती जी का आग्रह अटल रहा है — किसी भी राष्ट्रीय या धार्मिक आंदोलन की आत्मा श्रेय-लिप्सा नहीं, अपितु सत्य और सिद्धांत की अजस्र धारा होनी चाहिए। वे संवाद के लिए सभी दिशाओं में खुले रहते हैं, पर अपने विवेक और मूल्यों से कभी विचलित नहीं होते। यही उनकी संत-वृत्ति की पहचान है — निर्लिप्त, किंतु निष्क्रिय नहीं।
▪️ सार तत्व — सत्ता से बड़ा सिद्धांत, श्रेय से बड़ा सत्य
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती जी का व्यक्तित्व एक ऐसे दीपस्तंभ की भाँति है जो आँधियों में भी अविचल जलता रहता है। वे एक साथ संत हैं, चिंतक हैं और राष्ट्रधर्म के प्रहरी हैं। गौसंरक्षण हो, गंगा की अविरलता हो, राम जन्मभूमि का सांस्कृतिक प्रश्न हो अथवा सामाजिक समरसता का आदर्श — हर क्षेत्र में उनकी भूमिका निरंतर, सक्रिय और वैचारिक रही है।
आज की परम आवश्यकता यह है कि समाज व्यक्तियों को राजनीतिक पूर्वाग्रहों के चश्मे से नहीं, बल्कि उनके कृतित्व, सिद्धांत और जीवन-मूल्यों की कसौटी पर परखे। जब संतों की वाणी राष्ट्रहित में उठती है, तो वह किसी मठ या संप्रदाय की निजी धरोहर नहीं रहती — वह समूचे समाज की सामूहिक थाती बन जाती है।
▪️“स्मरण सूत्र — धर्म केवल मठों की परिधि में नहीं, राष्ट्र की धड़कन में जीवित रहता है।
सत्ता से बड़ा सिद्धांत होता है — और श्रेय से बड़ा, सत्य।”
✍️“मेरी कलम से – ब्रजेश कुमार त्रिवेदी”