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रांची बड़ी खबर कुख्यात नक्सली प्रशांत बोस उर्फ ‘किशन दा’ का निधन, चार दशक तक सुरक्षा एजेंसियों के लिए बना रहा चुनौती

रांची के राजेंद्र इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (RIMS) में शुक्रवार सुबह प्रतिबंधित नक्सली संगठन भाकपा (माओवादी) के पोलित ब्यूरो सदस्य प्रशांत बोस उर्फ ‘किशन दा’ का निधन हो गया। 75 वर्षीय बोस लंबे समय से बीमार थे और बिरसा मुंडा केंद्रीय कारा में बंद थे।

प्रशांत बोस, जिन्हें मनीष उर्फ बूढ़ा के नाम से भी जाना जाता था, मूल रूप से पश्चिम बंगाल के रहने वाले थे और माओवादी आंदोलन के शुरुआती कमांडरों में गिने जाते थे। वे देश के सात राज्यों—झारखंड, बिहार, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, छत्तीसगढ़, आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र—में सक्रिय रहे और कई बड़ी नक्सली वारदातों के मास्टरमाइंड माने जाते थे।

15 जवानों की हत्या समेत कई बड़े हमलों में था हाथ

प्रशांत बोस पर सुरक्षा बलों के 15 जवानों की हत्या का आरोप था। वर्ष 2021 में दिवाली के दिन धनबाद के तोपचांची क्षेत्र में पुलिस कैंप पर हुए हमले में उनकी अहम भूमिका बताई जाती है। इसके अलावा वे 2007 में झामुमो नेता सुनील महतो की हत्या सहित कई बड़ी घटनाओं में शामिल रहे।

100 से अधिक मामलों में था आरोपी, एक करोड़ का इनाम

देश के विभिन्न राज्यों में उनके खिलाफ 100 से अधिक मामले दर्ज थे, जिनमें से करीब 50 झारखंड में ही थे। उनकी गिरफ्तारी पर एक करोड़ रुपये का इनाम घोषित किया गया था। उन्हें माओवादी संगठन का ‘थिंक टैंक’ भी माना जाता था।

2021 में पत्नी के साथ हुए थे गिरफ्तार

झारखंड पुलिस ने 12 नवंबर 2021 को सरायकेला-चांडिल क्षेत्र के कांड्रा टोल प्लाजा के पास उन्हें उनकी पत्नी शीला मरांडी के साथ गिरफ्तार किया था। पुलिस को उनकी गतिविधियों की सूचना खुफिया इनपुट के आधार पर मिली थी।

नक्सल आंदोलन में लंबा सफर

प्रशांत बोस ने 1960 के दशक में नक्सली विचारधारा अपनाई और बाद में माओवादी कम्युनिस्ट सेंटर (MCC) के संस्थापक सदस्यों में शामिल रहे। 2004 में MCC का विलय भाकपा (माओवादी) में हुआ, जिसके बाद वे संगठन के शीर्ष नेतृत्व में शामिल हो गए।

अंतिम दिनों में बीमारी से जूझते रहे

बताया जाता है कि 2018 में उन्हें पैरालिसिस हो गया था। जेल में रहते हुए वे धार्मिक ग्रंथों का अध्ययन करते थे और अंतिम समय तक स्वास्थ्य समस्याओं से जूझते रहे।

प्रशांत बोस की मौत के साथ ही देश के माओवादी आंदोलन के एक बड़े चेहरे का अंत हो गया, जिसने चार दशकों तक सुरक्षा एजेंसियों के लिए बड़ी चुनौती पेश की।

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