"चूल्हे ठंडे, पेट खाली और हुक्मरानों की बेरुखी"
पटना की सड़कों पर फूटा कांग्रेस का जन-आक्रोश!
विजय कुमार, वरिष्ठ पत्रकार
पटना की सड़कों से उठी यह चिंगारी केवल एक राजनीतिक प्रदर्शन नहीं, बल्कि उस 'निकम्मेपन' के खिलाफ जनांदोलन है जिसने आम आदमी की रसोई को श्मशान बना दिया है।
आज राजधानी पटना का इनकम टैक्स चौराहा एक ऐतिहासिक गवाह बना। जब बिहार के कोने-कोने से आए सैकड़ों कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने प्रदेश अध्यक्ष राजेश कुमार के नेतृत्व में उग्र प्रदर्शन किया।
किल्लत या कत्ल-ए-उम्मीद?
गैस सिलेंडर की 'भयंकर किल्लत' और उससे उपजी 'भुखमरी' जैसे शब्द सुनने में भले ही कड़े लगें, लेकिन बिहार की गलियों और गांवों में यही आज की कड़वी हकीकत है। केंद्र और राज्य सरकार की डबल इंजन की जुगलबंदी अब जनता के लिए 'डबल आफत' साबित हो रही है। जब गरीब की रसोई में चूल्हा जलना बंद हो जाए, तो समझ लेना चाहिए कि लोकतंत्र की सेहत ठीक नहीं है।
संगठन की शक्ति और संघर्ष का संकल्प:
इस विरोध प्रदर्शन में सबसे महत्वपूर्ण पहलू था—एकता। गया जिला अध्यक्ष संतोष कुमार के नेतृत्व में आए कार्यकर्ताओं और प्रदेश सोशल मीडिया महासचिव खालिद अमीन की रणनीतिक सक्रियता ने यह स्पष्ट कर दिया है कि विपक्ष अब खामोश बैठने वाला नहीं है। प्रदेश के सभी 38 जिलों से आए सैकड़ों लोगों की भीड़ इस बात का प्रमाण है कि आक्रोश अब पटना की सीमा लांघकर हर जिले, हर गांव तक पहुंच चुका है।
सत्ता के अहंकार को चुनौती
शमी अख्तर खान, संजय चंद्रवंशी, चंदन कुशवाहा, धर्मेंद्र पासवान और सुनील पासवान जैसे जमीनी नेताओं का सड़कों पर उतरना यह दिखाता है कि समाज के हर वर्ग—पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक—में इस 'सिस्टम की विफलता' को लेकर भारी रोष है। यह प्रदर्शन एक प्रतीकात्मक संदेश है कि अगर सरकारें नींद से नहीं जागीं, तो आने वाले समय में जनता का यह गुस्सा वोटों की चोट के रूप में बरसेगा।
अंतिम सवाल
क्या सरकारें केवल चुनावी आंकड़ों और विज्ञापनों में मशगूल रहेंगी? क्या आम आदमी के खाली सिलेंडर और खाली पेट की आवाज दिल्ली और पटना के सत्ता के गलियारों तक पहुंचेगी?
कांग्रेस का यह प्रदर्शन एक चेतावनी है—जब पेट की आग और रसोई की राख एक साथ मिलती है, तो बड़े-बड़े सिंहासन डोलने लगते हैं।
अब समय आ गया है कि सरकारें अपनी 'निकम्मेपन' की चादर ओढ़कर सोना बंद करें, वरना इतिहास गवाह है कि भूखी जनता कभी समझौता नहीं करती।