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दिल का बसेरा – अध्याय 1 (कहानी) शेख जमीरुल हक खान चौधरी


अध्याय 1

सुबह की हल्की धूप धीरे-धीरे कमरे में फैल रही थी।
खिड़की के पर्दे हवा से हल्के-हल्के हिल रहे थे। बाहर चिड़ियों की आवाज़ गूंज रही थी, लेकिन उस कमरे में एक अजीब-सी खामोशी थी।
वह खामोशी उसके दिल जैसी थी… अधूरी और बोझिल।
बिस्तर पर बैठी वह लड़की चुपचाप सामने देख रही थी। उसकी आँखों में नींद नहीं थी, बल्कि अनगिनत सवाल थे।
जैसे वह रात भर सोई ही न हो… या शायद सोना ही भूल गई हो।
उसने एक गहरी सांस ली और खिड़की की तरफ देखा।
बाहर की दुनिया कितनी अलग थी—हर कोई कहीं न कहीं जा रहा था, कुछ पाने की उम्मीद में…
और वह?
वह तो जैसे खुद को ही कहीं खो चुकी थी।

“उठ गई तुम?”
रसोई से माँ की आवाज़ आई।
वह हल्के से चौंकी और धीरे से बोली, “जी, अभी आती हूँ।”
उसकी आवाज़ में थकान थी… उम्र से ज्यादा।
वह जल्दी से उठी और अपने दिन की शुरुआत करने लगी—
वही रोज़ के काम, वही जिम्मेदारियाँ, वही चुप्पी।
रसोई में माँ पहले से ही काम में लगी थीं।
उनके चेहरे पर चिंता साफ झलक रही थी, जैसे हर दिन कोई नया बोझ लेकर आता हो।
“जल्दी करो, बहुत काम है,” माँ ने कहा।
उसने बस सिर हिला दिया।
कहने को बहुत कुछ था… लेकिन कहने की आदत नहीं रही थी।

घर का माहौल अजीब था—
न पूरी तरह खुश, न पूरी तरह दुखी।
बस एक चलती हुई ज़िंदगी… जिसमें सुकून कहीं खो गया था।
पिता अपने काम में लगे रहते, लेकिन उनकी आंखों में जिम्मेदारियों का बोझ साफ दिखता था।
कभी पैसों की बात, कभी घर की परेशानी—सब कुछ इस घर का हिस्सा था।
और इन सबके बीच…
वह लड़की थी—जो सब संभाल रही थी, बिना कुछ कहे।

दिन बीतता गया।
काम करते-करते वह थक गई थी, लेकिन उसके चेहरे पर थकान से ज्यादा खालीपन था।
जैसे उसकी अपनी कोई दुनिया ही न हो।
थोड़ी देर के लिए जब वह अकेली हुई, तो खिड़की के पास जाकर खड़ी हो गई।
उसने आसमान की तरफ देखा।
“क्या मेरी ज़िंदगी भी कभी बदलेगी?”
उसने मन ही मन सोचा।
उसे ऐसा लगता था जैसे उसके दिल में कोई खाली जगह है—
एक ऐसा कोना, जो अभी तक किसी का इंतज़ार कर रहा है।
एक ऐसा “बसेरा”… जहाँ उसे सुकून मिल सके।

शाम होने लगी थी।
आसमान में सूरज ढल रहा था और हल्का अंधेरा फैलने लगा था।
वह छत पर खड़ी दूर तक देख रही थी।
तभी… उसकी नजर किसी पर पड़ी।
एक अनजान चेहरा…
जिसे उसने पहले कभी नहीं देखा था।
बस एक पल के लिए नजरें मिलीं—
और फिर सब कुछ जैसे रुक गया।
दिल की धड़कन थोड़ी तेज हो गई।
समझ नहीं आया क्यों…
वह जल्दी से नजरें झुका लेती है, लेकिन उस एक पल ने कुछ बदल दिया था।

रात हो गई।
वह अपने कमरे में वापस आई और बिस्तर पर बैठ गई।
आज भी दिन वैसे ही बीता था… लेकिन फिर भी कुछ अलग था।
उसके दिल में एक हल्की-सी हलचल थी…
जैसे कोई नई शुरुआत होने वाली हो।
उसने धीरे से आँखें बंद कीं और सोचा—
“क्या यही मेरा दिल का बसेरा बनेगा…?”

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