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“मोबाइल की बढ़ती लत से खतरे में बचपन, हिमाचल में जागरूकता की जरूरत” : धीरज रमौल

हिमाचल प्रदेश में तेजी से बढ़ती मोबाइल की लत बच्चों के बचपन पर गहरा प्रभाव डाल रही है, जिसे लेकर प्रयास सोसाइटी ने चिंता व्यक्त की है। संस्था के सचिव धीरज रमौल ने कहा कि आज के आधुनिक दौर में मोबाइल फोन जहां जीवन का अभिन्न हिस्सा बन चुका है, वहीं इसका अत्यधिक उपयोग बच्चों के मानसिक, सामाजिक और शारीरिक विकास के लिए गंभीर खतरा बनता जा रहा है।
उन्होंने बताया कि अभिभावकों की व्यस्त दिनचर्या के चलते बच्चे अब अधिक समय मोबाइल स्क्रीन पर बिताने लगे हैं। बच्चों को शांत रखने या व्यस्त रखने के लिए मोबाइल देना एक आसान उपाय बन गया है, लेकिन इसके दूरगामी परिणाम बेहद चिंताजनक हैं। इससे बच्चों में संवाद की कमी, सामाजिक दूरी और भावनात्मक कमजोरी जैसी समस्याएं बढ़ रही हैं।
धीरज रमौल ने कहा कि हिमाचल प्रदेश जैसे पहाड़ी राज्य में, जहां पारंपरिक रूप से परिवार और सामाजिक जुड़ाव मजबूत रहा है, वहां भी यह समस्या तेजी से बढ़ रही है। गांवों से लेकर शहरों तक बच्चे अब खेल के मैदानों से दूर होकर मोबाइल स्क्रीन तक सीमित हो रहे हैं, जिससे उनकी शारीरिक सक्रियता और सामाजिक व्यवहार दोनों प्रभावित हो रहे हैं।
उन्होंने अभिभावकों से अपील करते हुए कहा कि बच्चे वही सीखते हैं जो वे अपने आसपास देखते हैं। यदि माता-पिता स्वयं मोबाइल का अधिक उपयोग करते हैं, तो बच्चों में भी यही आदत विकसित होती है। इसलिए जरूरी है कि अभिभावक अपने व्यवहार में बदलाव लाएं और बच्चों के साथ अधिक समय बिताएं।
प्रयास सोसाइटी ने सुझाव दिया कि मोबाइल का संतुलित उपयोग ही इसका समाधान है। बच्चों के लिए स्क्रीन टाइम की सीमा तय की जाए और भोजन, सोने से पहले तथा पारिवारिक समय में मोबाइल का उपयोग न किया जाए। इसके स्थान पर बच्चों के साथ खेलना, कहानियां सुनाना, घूमने ले जाना और रचनात्मक गतिविधियों में शामिल करना चाहिए।
संस्था ने चेतावनी दी कि यदि समय रहते इस समस्या पर ध्यान नहीं दिया गया, तो आने वाली पीढ़ी भावनात्मक और सामाजिक रूप से कमजोर हो सकती है। इसलिए समाज के सभी वर्गों को मिलकर जागरूकता फैलाने और बच्चों के सुरक्षित एवं खुशहाल बचपन के लिए ठोस कदम उठाने की आवश्यकता है।

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