विलुप्त होती ग्राम सभा: गांव की आत्मा पर संकट, सामाजिक एकता कमजोर होने का खतरा
धनबाद/ग्रामीण क्षेत्र:-ग्रामीण भारत की पारंपरिक व्यवस्था की आधारशिला मानी जाने वाली ग्राम सभा आज धीरे-धीरे अपनी पहचान खोती नजर आ रही है। कभी गांव के विकास, निर्णय और सामाजिक एकता का केंद्र रही ग्राम सभा अब लोगों की उदासीनता के कारण कमजोर होती जा रही है।
ग्रामीणों के बीच यह कहावत प्रचलित रही है कि “ना लोकसभा, ना विधानसभा, सबसे बड़ी ग्राम सभा”, लेकिन वर्तमान हालात इस सोच से बिल्कुल अलग दिखाई देते हैं। आज गांव के लोग निजी जीवन और व्यस्तताओं में इतने उलझ चुके हैं कि सामूहिक बैठकों और निर्णय प्रक्रिया में उनकी भागीदारी लगातार घटती जा रही है।
जागरूकता और सहभागिता में कमी
ग्राम सभा की बैठकों में न तो पर्याप्त जागरूकता दिख रही है और न ही पहले जैसी एकता। गांव के पारंपरिक नेतृत्व जैसे मुण्डा और मानकी की भूमिका भी धीरे-धीरे सीमित होती जा रही है। लोग एक-दूसरे को जानते तो हैं, लेकिन सामाजिक रूप से जुड़े नहीं हैं।
संकट के समय ही याद आती है ग्राम सभा
विशेषज्ञों का मानना है कि गांव या समाज पर जब कोई संकट आता है, तभी लोगों को ग्राम सभा की अहमियत याद आती है। सामान्य दिनों में न तो इसकी बैठकों में भागीदारी होती है और न ही सामूहिक निर्णय लेने की परंपरा को महत्व दिया जाता है।
सामाजिक ताने-बाने पर असर
इस बदलती प्रवृत्ति का असर गांव की एकता और सामाजिक संरचना पर साफ दिखाई दे रहा है। जहां पहले मिल-जुलकर फैसले होते थे, वहां अब व्यक्तिगत स्वार्थ हावी होता जा रहा है। इससे गांवों में आपसी दूरी और विखंडन की स्थिति बन रही है।
भविष्य के लिए चेतावनी
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते इस स्थिति को नहीं सुधारा गया, तो आने वाली पीढ़ी के लिए ग्राम सभा केवल किताबों तक सीमित रह जाएगी।
समाधान की जरूरत
सामाजिक कार्यकर्ताओं ने ग्रामीणों से अपील की है कि वे ग्राम सभा की बैठकों में सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित करें, अपनी बात रखें और दूसरों की भी सुनें। मजबूत गांव ही मजबूत देश की नींव होता है, और इसके लिए ग्राम सभा को पुनः सक्रिय करना आवश्यक है।