बिना रजिस्ट्रेशन सालों से चल रहा था अकलीमा हॉस्पिटल, छापेमारी के नाम पर सिर्फ 'नोटिस' का खेल!
बिना रजिस्ट्रेशन सालों से चल रहा था अकलीमा हॉस्पिटल, छापेमारी के नाम पर सिर्फ 'नोटिस' का खेल!
अंधेरगर्दी: कमियां मिलीं, लेकिन बताने में 'असमर्थ' रहा विभाग!
इटवा, सिद्धार्थनगर। इटवा कस्बे में स्वास्थ्य विभाग की नाक के नीचे चल रहा अवैध अस्पतालों का काला कारोबार अब जगजाहिर हो चुका है। डुमरियागंज रोड पर स्थित अकलीमा हॉस्पिटल सालों से बिना किसी वैध रजिस्ट्रेशन के मरीजों की जिंदगी से खिलवाड़ कर रहा था, लेकिन जब भारी दबाव के बाद प्रशासन की नींद खुली, तो कार्रवाई के नाम पर जो 'तमाशा हुआ, उसने पूरे तंत्र को कठघरे में खड़ा कर दिया है। बुधवार को स्वास्थ्य विभाग और स्थानीय प्रशासन ने भारी दलबल के साथ अस्पताल पर धावा बोला। टीम में सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र के अधीक्षक डॉ. संदीप द्विवेदी और तहसीलदार इटवा शामिल थे। जाँच में जो सच सामने आया वो चौंकाने वाला था अस्पताल का कोई रजिस्ट्रेशन नहीं था। सालों से एक अवैध इमारत में इलाज का धंधा धड़ल्ले से फल-फूल रहा था। हैरानी की बात यह है कि इतनी बड़ी अनियमितता मिलने के बावजूद स्वास्थ्य विभाग व प्रशासन ने अस्पताल को सीज करने या संचालक पर एफआईआर दर्ज करने के बजाय सिर्फ एक अदद 'नोटिस' थमाकर अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लिया। सूत्रों की मानें तो अस्पताल में भारी खामियां मिली थीं, लेकिन स्वास्थ्य विभाग इन कमियों को सार्वजनिक करने में असमर्थ नजर आया। सवाल यह उठता है कि क्या विभाग इन कमियों को छिपाकर अवैध संचालकों को बचाने का रास्ता साफ कर रहा है? जब अस्पताल का रजिस्ट्रेशन ही नहीं है, तो उसे एक मिनट भी संचालित रहने की अनुमति कैसे दी जा सकती है? क्या प्रशासन किसी बड़े हादसे का इंतजार कर रहा है? इटवा कस्बे में अकलीमा जैसे दर्जनों क्लीनिक और अस्पताल बिना किसी डर के चल रहे हैं। चर्चा है कि स्थानीय स्वास्थ्य विभाग के संरक्षण और सांठगांठ के बिना यह अवैध धंधा मुमकिन नहीं है। छापेमारी के दौरान केवल नोटिस देना इस बात का पुख्ता प्रमाण है कि कार्रवाई के नाम पर सिर्फ औपचारिकता निभाई जा रही है ताकि जनता की आंखों में धूल झोंकी जा सके। इस पूरे मामले पर स्वास्थ्य इटवा अधीक्षक डॉ. संदीप द्विवेदी का कहना है कि, "अस्पताल का रजिस्ट्रेशन नहीं है, डॉक्टर की डिग्री मिली है, इसलिए फिलहाल नोटिस दे दिया गया है। अब जनता यह पूछ रही है कि क्या डिग्री होना अवैध रूप से अस्पताल चलाने का लाइसेंस है? बिना रजिस्ट्रेशन के चल रहे इस डेथ ट्रैप पर कठोर धाराओं में कार्रवाई क्यों नहीं की गई?