पूर्व सैनिकों की अनदेखी: ECHS बदहाली और 'डिसेबिलिटी पेंशन' पर टैक्स को लेकर विपक्ष हमलावर
नई दिल्ली: देश की सीमाओं की रक्षा करने वाले जांबाज रिटायरमेंट के बाद अपनी बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाओं और सम्मान के लिए संघर्ष करने को मजबूर हैं। हाल ही में 'जनसंसद' में विपक्ष के नेता श्री राहुल गांधी और पूर्व सैनिकों के बीच हुई मुलाकात ने एक्स-सर्विसमैन कंट्रीब्यूटरी हेल्थ स्कीम (ECHS) की गंभीर खामियों को उजागर कर दिया है।
ECHS: 72 लाख जिंदगियों का सवाल, पर बजट में 'कंगाल'
देश के लगभग 72 लाख पूर्व सैनिक और उनके परिवार अपनी स्वास्थ्य सेवाओं के लिए ECHS पर निर्भर हैं। राहुल गांधी द्वारा संसद में उठाए गए सवालों के बाद यह साफ हो गया है कि इस योजना की स्थिति चिंताजनक है:
CAG की चेतावनी: नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) ने स्पष्ट कहा है कि ECHS को पर्याप्त धनराशि नहीं मिल रही है।
सरकार की चुप्पी: जब संसद में बकाये की राशि और फंड की कमी पर सवाल पूछा गया, तो सरकार ने कोई स्पष्ट डेटा देने के बजाय सिर्फ इतना माना कि "देरी होती है।"
इलाज में बाधा: फंड की कमी के कारण सूचीबद्ध (Empanelled) अस्पतालों को भुगतान नहीं हो पा रहा है, जिसका सीधा असर पूर्व सैनिकों के इलाज पर पड़ रहा है।
सेवा का सिला 'टैक्स'? दिव्यांग सैनिकों पर नई मार
एक तरफ सरकार सैनिकों के सम्मान की बात करती है, वहीं दूसरी तरफ वित्त विधेयक में एक ऐसा प्रस्ताव लाया गया है जिसने सैन्य गलियारों में भारी नाराजगी पैदा कर दी है।
विवादित प्रस्ताव: यदि कोई सैनिक शारीरिक अक्षमता (Disability) के बावजूद अपनी सेवा जारी रखता है, तो उसकी Disability Pension पर अब टैक्स लगाया जाएगा।
विशेषज्ञों और पूर्व सैनिकों का मानना है कि यह कदम उन बहादुर जवानों को 'सजा' देने जैसा है जो चोटिल होने के बावजूद देश की सेवा का जज्बा रखते हैं। सरकार ने दिव्यांग सैनिकों के लिए टैक्स छूट से जुड़े सवालों को भी सदन में नजरअंदाज कर दिया है।
देश की सुरक्षा से खिलवाड़ या प्रशासनिक विफलता?
विपक्ष का आरोप है कि मोदी सरकार जवानों के शौर्य का विज्ञापन तो करती है, लेकिन जब उन्हें वास्तविक समर्थन और चिकित्सा सुविधा देने की बारी आती है, तो हाथ पीछे खींच लेती है।
सैनिकों की मांग: ECHS के लिए बजट का उचित आवंटन और डिसेबिलिटी पेंशन पर प्रस्तावित टैक्स को तुरंत वापस लिया जाए।
जवाबदेही का अभाव: सरकार के पास न तो स्वास्थ्य सेवाओं में देरी का कोई ठोस कारण है और न ही भविष्य की कोई स्पष्ट योजना।
निष्कर्ष: अपनी पूरी जवानी देश के नाम कर देने वाले सैनिकों को रिटायरमेंट के बाद अस्पतालों के चक्कर काटने और अपने हक की पेंशन पर टैक्स देने के लिए मजबूर करना, न केवल उनके साथ अन्याय है बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा के मनोबल पर भी एक गहरी चोट है।