कहानी: "कायनात": अध्याय 3: शेख जमीरुल हक खान चौधरी
अध्याय 3: राज़, ताक़त और पहचान
आयत उस अजनबी को ध्यान से देख रही थी।
उसकी आँखों में कोई डर नहीं था…
बस एक गहरी शांति — जैसे वो सब कुछ जानता हो।
"तुम कौन हो?" आयत ने फिर पूछा।
वो कुछ कदम आगे बढ़ा और बोला —
"मेरा नाम ज़ायान है… और मैं इस क़ायनात का रक्षक हूँ।"
"रक्षक?" आयत हैरान रह गई,
"तो फिर… मुझे यहाँ क्यों लाया गया है?"
ज़ायान ने उसकी तरफ देखा —
जैसे वो उसके अंदर कुछ ढूंढ रहा हो।
"तुम्हें यहाँ लाया नहीं गया… आयत।
तुम्हें चुना गया है।"
अम्मी का सच
"चुना गया? किसलिए?"
ज़ायान ने धीरे से हाथ उठाया…
और अचानक उनके चारों तरफ की हवा चमकने लगी।
कुछ ही पलों में आयत के सामने एक पुरानी याद (vision) उभर आई।
उसने देखा —
उसकी अम्मी… उसी जगह खड़ी थीं।
उनके हाथ में भी वही डायरी थी, और उनके आसपास भी वही रोशनी।
"तुम्हारी अम्मी… इस क़ायनात की आख़िरी संरक्षक थीं।"
आयत की आँखों में आँसू आ गए —
"तो उन्होंने मुझे कभी बताया क्यों नहीं?"
ज़ायान ने गहरी आवाज़ में कहा —
"क्योंकि हर सच्चाई का एक वक़्त होता है…
और अब वो वक़्त आ गया है।"
आयत की असली ताक़त
अचानक ज़ायान ने आयत का हाथ पकड़ा।
जैसे ही उसका हाथ छुआ…
आयत के अंदर एक अजीब-सी ऊर्जा दौड़ गई।
उसकी आँखें चमकने लगीं…
और उसके चारों तरफ हवा घूमने लगी।
"तुम सिर्फ एक आम इंसान नहीं हो, आयत…"
"तुम 'नूर-ए-क़ायनात' हो —
वो ताक़त जो इस पूरी दुनिया को बचा भी सकती है…
और मिटा भी सकती है।"
आयत घबरा गई —
"मैं? ये कैसे मुमकिन है?"
ज़ायान ने जवाब दिया —
"क्योंकि तुम्हारे अंदर वही ताक़त है…
जो तुम्हारी अम्मी में थी —
लेकिन उससे भी ज्यादा।"
खतरे की आहट
तभी अचानक…
आसमान काला पड़ने लगा।
वो खूबसूरत क़ायनात, जो अभी तक चमक रही थी,
अब धीरे-धीरे अंधेरे में बदलने लगी।
ज़ायान का चेहरा गंभीर हो गया।
"वो आ गया है…"
"कौन?" आयत ने डरते हुए पूछा।
ज़ायान ने आसमान की तरफ देखा और कहा —
"ज़ुल्मत…"
"क़ायनात का सबसे बड़ा दुश्मन।"
अचानक एक भयानक आवाज़ गूंजी —
जैसे कोई परछाईं आसमान से उतर रही हो।
पहली टक्कर
अंधेरे के बीच एक साया उभरा…
उसकी आँखें लाल थीं, और उसकी मौजूदगी से ही डर फैल रहा था।
"तो ये है… नई संरक्षक?" उस साए ने हंसते हुए कहा।
आयत पीछे हट गई…
लेकिन ज़ायान उसके सामने खड़ा हो गया।
"जब तक मैं हूँ, तुम उसे छू भी नहीं सकते!"
साया मुस्कुराया —
"देखते हैं… ये ताक़त इसे बचा पाती है या नहीं…"
और अचानक…
उसने आयत की तरफ एक काली ऊर्जा फेंकी!
आयत ने आँखें बंद कर लीं…
लेकिन तभी उसके अंदर से एक तेज़ रोशनी निकली।
धड़ाम!!!
दो ताक़तें टकराईं —
रोशनी और अंधेरा।
और उसी पल…
क़ायनात की किस्मत तय होने लगी।