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कहानी : "क़ायनात" (Qaynaat) ( एक रहस्य, इश्क़ और तक़दीर से जुड़ी कहानी ): पहला अध्याय : शेख जमीरुल हक खान चौधरी


अध्याय 1: एक अनजानी दस्तक
रात के ठीक 2 बज रहे थे…
आसमान पर चाँद था, मगर उसकी रोशनी में भी एक अजीब-सी बेचैनी थी।
आयत अपने कमरे की खिड़की के पास खड़ी थी।
हवा हल्की-हल्की चल रही थी, लेकिन उसके दिल में तूफ़ान था।
उसे ऐसा लग रहा था जैसे कोई उसे पुकार रहा हो…
एक आवाज़, जो न सुनाई दे रही थी, न समझ में आ रही थी।
"ये क्या हो रहा है मेरे साथ?" उसने खुद से पूछा।
तभी अचानक उसकी टेबल पर रखी पुरानी डायरी अपने आप खुल गई।
उस डायरी को उसने कभी नहीं छुआ था —
वो उसकी अम्मी की थी, जो सालों पहले उसे छोड़कर चली गई थीं।
डायरी के पन्ने अपने आप पलटने लगे…
और एक पन्ने पर आकर रुक गए।
उस पर लिखा था:
"जब क़ायनात तुम्हें पुकारे, तो समझ लेना —
तुम्हारी तक़दीर बदलने वाली है…"
आयत के हाथ काँपने लगे।
उसने जल्दी से डायरी बंद कर दी, लेकिन दिल की धड़कनें और तेज़ हो गईं।
उसी वक्त…
दरवाज़े पर किसी ने दस्तक दी।
ठक… ठक… ठक…
रात के 2 बजे कौन हो सकता है?
आयत धीरे-धीरे दरवाज़े की ओर बढ़ी।
हर कदम के साथ उसका डर बढ़ता जा रहा था।
"कौन है?" उसने काँपती आवाज़ में पूछा।
बाहर से कोई जवाब नहीं आया…
बस फिर वही दस्तक।
उसने हिम्मत करके दरवाज़ा खोला —
लेकिन बाहर कोई नहीं था।
सिर्फ एक काला लिफाफा जमीन पर पड़ा था।
आयत ने धीरे से उसे उठाया…
उस पर लिखा था:
"तुम्हें चुना गया है…"
उसकी आँखें फैल गईं।
"किसके लिए…?" उसने बुदबुदाया।
तभी अचानक पीछे से वही अनजानी आवाज़ गूंजी —
"क़ायनात के राज़ खोलने के लिए…"
आयत ने पलटकर देखा…
लेकिन कमरे में कोई नहीं था।
अब डर के साथ-साथ एक सवाल उसके दिल में घर कर चुका था —
क्या सच में कोई उसे देख रहा है?
या फिर ये सब उसकी किस्मत का खेल है?

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