कहानी : "अमानत" : नवां अध्याय : शेख जमीरुल हक खान चौधरी
अध्याय 9 — सरहद के पार गुनाह
अब्दुल वाहिद खान को अदालत से बरी हुए दो महीने हो चुके थे।
सराय की लड़कियाँ अब अलग-अलग संस्थाओं में पढ़ाई कर रही थीं।
बिस्मिल्लाहपुर में अमन का माहौल था —
पर अब्दुल की आंखों में सुकून नहीं था।
“अफजल अभी ज़िंदा है… और आज़ाद भी।”
एक रात रहमत अली एक खबर लेकर आया —
“चाचा, नेपाल बॉर्डर पर दो लड़कियाँ मिलीं…
जिन्होंने ‘अफजल कबीर’ का नाम लिया है।”
खुलता हुआ जाल
बॉर्डर पुलिस की रिपोर्ट बताती थी कि
नेपाल, बांग्लादेश और भारत के बीच
एक मानव तस्करी का अंतरराष्ट्रीय रैकेट चल रहा है।
और इसका मास्टरमाइंड कोई और नहीं —
बल्कि अफजल कबीर था।
वो अब्दुल को खत्म करने में इसलिए लगा था,
क्योंकि अब्दुल उस ‘अमानत’ को बचा रहा था
जिस पर अफजल ‘सौदे’ करना चाहता था।
दिल्ली की एक मीटिंग
अब्दुल को एक सामाजिक संगठन ने दिल्ली बुलाया।
उन्होंने कहा —
“आपने जो किया वो एक आंदोलन है।
हम चाहते हैं कि आप इस पूरे अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क के खिलाफ
अभियान का चेहरा बनें।”
अब्दुल चुपचाप सुनता रहा।
फिर बोला —
“मैं चेहरा नहीं बनूंगा।
मैं एक साया बनूंगा —
जो हर उस लड़की के पीछे खड़ा रहेगा
जिसे दुनिया ने बेचा हो।”
अफजल की अगली चाल
इसी बीच अफजल ने नेपाल में एक नया ठिकाना बना लिया था।
वह जानता था कि अब्दुल ज़िंदा है,
और अब वो सिर्फ नाम या शोहरत नहीं,
बल्कि ‘सच की रौशनी’ बन चुका है।
अफजल ने अपने एक एजेंट को कहा —
“अगर अब्दुल मेरी राह में आया,
तो इस बार उसे खत्म नहीं करूंगा,
बल्कि उसे दुनिया की नजरों में गुनाहगार बना दूंगा —
एक बार फिर।”
अब्दुल की तैयारी
अब्दुल ने सराय में एक दीवार पर नया बोर्ड लगवाया:
"यहाँ सिर्फ अमानतें नहीं रहतीं —
यहाँ इंसानियत का असल चेहरा साँस लेता है।"
वह अब सराय को एक नेटवर्क में बदल रहा था —
जहाँ नेपाल, बांग्लादेश, भारत और अफगानिस्तान की सरहदों से
आने वाली लड़कियों को कानूनी पहचान,
शिक्षा, और सुरक्षा दी जा सके।
अब लड़ाई सिर्फ शहर की नहीं थी —
ये जंग अब सरहद पार के सौदागरों से थी।
अंत में…
अब्दुल ने एक बार फिर रहमत अली से कहा —
“अमानत का मतलब सिर्फ़ बचाना नहीं होता,
बल्कि जब ज़रूरत पड़े,
तो उसे इंसाफ दिलाने के लिए दुनिया से भी लड़ना होता है।”
रहमत बोला —
“और आप लड़ेंगे?”
अब्दुल ने आसमान की तरफ देखा —
“नहीं… अब लड़कियाँ लड़ेंगी।
मैं सिर्फ उनकी ढाल बनूंगा।”