कहानी : "अमानत" : सातवां अध्याय : शेख जमीरुल हक खान चौधरी
अध्याय 7 — नकाब उतरने लगा है
अब्दुल को ज़मानत पर रिहाई मिल चुकी थी,
मगर उसकी आँखों में चैन नहीं था।
वो जानता था कि अफजल अब कोई और चाल चलेगा —
और अगली बार हमला शायद सिर्फ उसकी इज़्ज़त पर नहीं,
बल्कि जान पर हो।
“अब वक्त है कि सच्चाई खुद बोले,”
उसने रहमत अली से कहा।
उधर, अफजल कबीर अपनी हवेली में बैठा
गुस्से और बौखलाहट में योजनाएँ बना रहा था।
“अगर लड़कियाँ अब्दुल के साथ हैं,
तो किसी को तोड़ना पड़ेगा।”
उसी रात उसने एक लड़की के भाई को बुलवाया,
जो गरीबी से तंग आकर अपनी बहन को एक बार बेचने पर राज़ी हो गया था।
“अगर तू कह दे कि अब्दुल ने तेरी बहन को बहकाया,
तो मैं तुझे और तेरी अम्मी को कोलकाता में मकान दिलवा दूंगा।”
उस भाई की आँखों में लालच और झिझक दोनों थे…
मगर अगले दिन वह थाने में नहीं पहुँचा।
उसके बजाय, एक और लड़की — सलीमा —
सीधे प्रेस क्लब पहुँच गई।
प्रेस क्लब का धमाका
सलीमा ने पत्रकारों के सामने एक लिफाफा खोला।
उसमें था एक पेन ड्राइव —
जिसमें सराय में लगे गुप्त कैमरे से मिली फुटेज थी।
वो फुटेज दिखा रही थी कि कैसे अफजल कबीर के लोग
रात में सराय के बाहर घूमते हैं,
लड़कियों को धमकाते हैं, और
पैसे और लालच से बहकाने की कोशिश करते हैं।
“ये है वो आदमी जिसे बिस्मिल्लाहपुर अब तक ‘समाजसेवी’ समझता रहा,”
सलीमा ने कहा।
फुटेज सोशल मीडिया पर वायरल हो गई।
शहर में आक्रोश फैल गया।
“अब्दुल को फँसाया गया है!”
“अफजल का असली चेहरा अब सामने है!”
जनता की अदालत
अगले ही दिन बिस्मिल्लाहपुर की गलियों में लोगों ने अफजल की तस्वीरों को उल्टा टाँग दिया।
उसकी हवेली के बाहर प्रदर्शन शुरू हो गया।
लोग नारे लगा रहे थे:
"इंसानियत के दुश्मन को सज़ा दो!"
"अमानत का सौदागर, शहर छोड़ो!"
अफजल हवेली में घिर चुका था।
वो भागना चाहता था, मगर अब पुलिस भी दबाव में थी।
एक सीबीआई जांच का आदेश दिया गया।
अब्दुल पहली बार सराय के बाहर
सर उठाकर खड़ा था,
उसके पास कोई हथियार नहीं था —
सिर्फ सच और इंसानियत का उजाला था।
और तब...
अब्दुल ने लड़कियों की तरफ देखा और कहा:
“तुम सब मेरी अमानत हो।
अब वक्त है कि तुम खुद को दुनिया के सामने साबित करो।
मैंने सिर्फ दरवाज़ा खोला है — रास्ता अब तुम्हारा है।”
ज़ीनत मुस्कुराई और बोली:
“चाचा, अब हम आपकी तरह किसी को बचाएंगे।”