कहानी : "अमानत" : छठवाँ अध्याय : शेख जमीरुल हक खान चौधरी
अध्याय 6 — झूठ की सलाखें, सच की आवाज़
बिस्मिल्लाहपुर की सुबह अब्दुल के लिए हमेशा एक नई उम्मीद लेकर आती थी,
मगर आज की सुबह कुछ अलग थी।
सराय के दरवाज़े पर पुलिस की जीप रुकी।
“अब्दुल वाहिद खान?”
“जी।”
“आपको गिरफ़्तार किया जाता है — नाबालिग लड़कियों के साथ मानसिक शोषण और अवैध गतिविधियों के आरोप में।”
रहमत अली चीख उठा —
“ये झूठ है! पूरी साजिश है!”
मगर हथकड़ी अब्दुल के हाथों में पड़ चुकी थी।
अब्दुल को जब थाने ले जाया गया,
तो वहां पहले से एक लड़की मौजूद थी —
नकाब में चेहरा छुपाए,
और सामने रखा एक लिखित बयान:
“अब्दुल ने हमारे साथ मानसिक दबाव डाला, हमें धर्म बदलवाने की कोशिश की।”
अफजल ने अपने रसूख और पैसों से लड़की को ख़रीद लिया था।
पूरे शहर में खबर फैल गई।
मीडिया चैनलों पर हेडलाइन चल रही थी:
“इंसानियत का नकाब या ढोंग? अब्दुल वाहिद पर संगीन आरोप!”
लेकिन जब सराय की बाक़ी लड़कियों को यह पता चला,
तो उनमें जैसे आग लग गई।
ज़ीनत ने बाकी लड़कियों को इकट्ठा किया और कहा:
“अगर आज हम चुप रहे,
तो कल कोई और अब्दुल हमें बचाने नहीं आएगा।”
वो सब लड़कियाँ एक साथ थाने पहुँचीं।
प्रेस भी जमा था, कैमरे थे, भीड़ थी।
ज़ीनत सबसे आगे आई और थाने के बाहर बोली —
“हम अब्दुल वाहिद के साथ हैं।
वो हमारी जिंदगी का रखवाला है, सौदागर नहीं।
अगर उसे जेल भेजा गया,
तो हम सब जेल जाने को तैयार हैं।”
हर लड़की ने अपने गले में वो तख्ती डाली जिस पर लिखा था:
"हम अमानत हैं — और अब्दुल हमारा अमानतदार है।"
इस प्रदर्शन की खबर जब कोर्ट तक पहुँची,
तो अब्दुल को ज़मानत मिल गई।
जेल से बाहर आते वक्त भीड़ एकटक उसे देख रही थी —
अब वो सिर्फ एक इंसान नहीं था,
बल्कि इंसानियत की मिसाल बन चुका था।
अफजल कबीर को पहली बार हार महसूस हुई।
और अब बिस्मिल्लाहपुर का सवाल था —
“क्या सच में अब्दुल को मिटाया जा सकता है?”