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कहानी : "अमानत" : पाँचवाँ अध्याय : शेख जमीरुल हक खान चौधरी


अध्याय 5 — साज़िश की परछाईं
बिस्मिल्लाहपुर अब बदल रहा था।
जहाँ कभी लड़कियों की चीखें दबा दी जाती थीं,
वहीं अब स्कूल की घंटी और हँसी की आवाज़ें गूंजने लगी थीं।
अब्दुल वाहिद खान की मेहनत रंग ला रही थी।
सराय अब “अमानत गृह” कहलाने लगा था —
एक ऐसा ठिकाना जहाँ टूटी रूहें मरहम पाती थीं।
लेकिन…
शहर के किसी कोने में कोई तिलमिला रहा था।
अफजल कबीर।
जब उसे ये ख़बर मिली कि अब्दुल ने उन्हीं लड़कियों को पढ़ा-लिखा कर समाज की मुख्यधारा में ला खड़ा किया है,
तो उसके चेहरे पर मुस्कान नहीं, शिकन थी।
“ये आदमी मेरी तिजारत पर सीधा हमला कर रहा है।”
उसने गुस्से में अपना शीशा फेंक दिया।
उसी रात उसकी हवेली में मीटिंग बुलाई गई —
पुराने रसूखदार, कुछ पुलिस अफसर, और दो-तीन दबंग नेता उसके सामने बैठे थे।
अफजल बोला —
“अब्दुल अब्दुल नहीं रहा। वो एक तहरीक बन गया है।
अगर अब भी ना रोका गया, तो हमारा धंधा खत्म हो जाएगा।”
एक नेता ने पूछा —
“तो क्या करें?”
अफजल ने सिगार सुलगाया —
“उसे उसी के उसूलों से तोड़ो।
उसे एक ऐसा इल्ज़ाम दो, जिससे वो इंसानियत की अदालत में भी गुनहगार लगे।”
प्लान बन चुका था।
अगली सुबह, बिस्मिल्लाहपुर के अख़बार में एक सनसनीखेज़ ख़बर थी:
"अमानत गृह में हो रहा है धर्मांतरण?
छब्बीस लड़कियाँ अब्दुल की शिक्षा के बहाने भटकाई जा रही हैं!"
शहर में हंगामा मच गया।
भीड़ सराय के बाहर जमा होने लगी।
कुछ नारे लगाने लगे —
“धोखा है ये इंसानियत का!”
“सराय बंद करो, अब्दुल को गिरफ़्तार करो!”
रहमत अली डर गया।
लड़कियाँ सहम गईं।
मगर अब्दुल…
वो अब्दुल नहीं था जो झुकता था।
उसने दरवाज़ा खोला और भीड़ के सामने आया।
“जिन्हें लगता है कि मैं इन लड़कियों का धर्म बदलवा रहा हूँ,
वो आकर देख लें —
यहाँ सिर्फ किताबें हैं,
सिर्फ अल्फाज़ हैं,
सिर्फ इंसानियत की भाषा है।”
“मैंने इनके नाम नहीं बदले,
ना मज़हब,
मैंने सिर्फ इनके ज़ख्मों पर पट्टी रखी है।”
कुछ लोग चुप हो गए।
कुछ को शर्म आने लगी।
उसी समय एक लड़की ज़ीनत भीड़ के सामने आकर बोली —
“अगर अब्दुल चाचा न होते,
तो शायद मैं अब तक किसी कूड़े के ढेर में मिल चुकी होती।”
भीड़ धीरे-धीरे छंटने लगी।
लेकिन अफजल…
उसकी आँखों में अब भी आग थी।
“अब वक्त है, अब्दुल को मिटाने का — हमेशा के लिए।”

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