कहानी :“अमानत” : तीसरा अध्याय : शेख जमीरुल हक खान चौधरी
अध्याय 3 — दो रास्ते, एक मुक़द्दर
वक़्त था जब अब्दुल वाहिद खान और अफजल कबीर एक ही चाय की दुकान पर बैठकर अपनी जवानी के ख्वाब बुना करते थे। दोनों ने एक साथ मदरसे की तालीम पाई, एक साथ सर्दियों की रातों में मस्जिद की चटाई पर सोए, और एक साथ इंसाफ और इंसानियत की बातें सीखी थीं।
अब्दुल तब भी गहरा सोचता था, और अफजल तब भी ऊँचा उड़ने की बातें करता था।
“कभी सोचो अब्दुल, हम दोनों अगर बड़े आदमी बन जाएं… तो बिस्मिल्लाहपुर की तक़दीर ही बदल दें,” अफजल कहा करता।
“हां, लेकिन जो ताक़त हमें अल्लाह देता है, वो दूसरों की सेवा के लिए होती है, न कि अपनी जेब भरने के लिए,” अब्दुल जवाब देता।
वक़्त गुज़रा।
अब्दुल ने ग़रीबों की खिदमत में खुद को खो दिया,
और अफजल ने अमीरों की मेहफिलों में खुद को पा लिया।
एक रोज़ अफजल बिस्मिल्लाहपुर लौटा।
उसके साथ थी महंगी गाड़ियों की कतारें, सूट-बूट में चमचों की भीड़, और आँखों में वो तक़ब्बुर (घमंड), जो दौलत से पैदा होता है।
अब्दुल ने उसे गले लगाना चाहा,
मगर अफजल ने हाथ आगे बढ़ाने से पहले सवाल कर दिया —
“अब भी वही झोंपड़ी, अब्दुल?”
अब्दुल मुस्कुराया —
“झोंपड़ी में रोटियाँ कम होती हैं, लेकिन नींद सुकून वाली आती है।”
अफजल ने अपनी जेब से एक लिफाफा निकाला —
“इसमें है बिस्मिल्लाहपुर का नया नक़्शा।
शहर को चमका देंगे।
बस… थोड़ी ‘खामोशी’ की ज़रूरत है।”
अब्दुल ने लिफाफा नहीं खोला।
“शहर की गलियों को पॉलिश करने से पहले,
शहर की रूह को साफ करना ज़रूरी है।”
और यहीं से शुरू हुआ दोनों के रास्तों का बँटवारा।
अब्दुल, जो बुराई से लड़ने की कसम खा चुका था,
और अफजल, जो बुराई का ताज पहनने चला था।
धीरे-धीरे शहर में ग़ायब होने लगीं लड़कियाँ।
नकली NGOs खुलने लगे।
और हर कोई जानता था कि पर्दे के पीछे कौन है।
मगर अब्दुल चुप नहीं रहा।
उसने अफजल से आख़िरी बार मिलने की कोशिश की।
"अफजल, तुझे अल्लाह ने बहुत कुछ दिया है। मगर तू उसे ज़हर में घोल रहा है। लौट आ… अभी भी वक़्त है।”
अफजल ने सिगार की राख ज़मीन पर झाड़ी,
और कहा —
“इस ज़मीन पर अमानतों की कीमत नहीं,
बस तिजारत चलती है।”
अब्दुल ने उसकी आँखों में देखा —
“फिर याद रख,
जिस दिन तेरी तिजारत में इंसान बिकने लगे,
उस दिन तेरे खिलाफ सबसे पहले मैं खड़ा रहूंगा।”
“तेरी इंसानियत हार जाएगी, अब्दुल।”
“तो फिर देखेंगे — अमानत बड़ी होती है या तिजारत।”